फोल्डिंग टेबल, फोल्डिंग सोफा और न जाने क्या-क्या। घर में रखने की जगह नहीं तो सारा फोल्डिंग सामान वापरा जाने लगा है। स़ड़क पर जगह नहीं है तो क्या किया जाए। इसका जवाब है 'सिटी कार'। इसे फोल्डिंग कार कहा जा सकता है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नालॉजी (एमआईटी) के वैज्ञानिकों ने इस तरह के वाहन का मॉडल तैयार कर लिया है। वह अपने आप चल भी सकता है। यह कार ऐसी है कि यदि आप कहीं लेकर गए और पार्किंग की जगह नहीं है तो केवल एक बटन दबाना होगा और कार का आकार आधा हो जाएगा। एमआईटी के प्रो. बिल मिटशैल का कहना है कि हमने शहरों के लिए एक जोरदार वाहन तैयार कर लिया है। एमआईटी को कैम्ब्रिज का थिंक टैंक माना जाता है।
अभी तक इस तरह का वाहन विकसित नहीं किया गया है। परंतु इसका छोटा स्वरूप बन गया है। इसे डिस्प्ले के लिए कैम्पस म्यूजियम में रखा गया है। जल्द ही इसका मॉडल आ जाएगा। कई इंजीनियर इस काम में लगे हैं। इसका आकार गोल्फ कार्ट के समान है। अमेरिका, योरप और एशिया के शहरों में यातायात की समस्या की वजह से जो परेशानी आती है, यह उसका जवाब हो सकता है।
इससे न तो प्रदूषण होता है और न ही पेट्रोल लगता है। यह बैटरी से चलने वाला वाहन होगा। इसे दो लोगों के बैठने के लायक बनाया जा रहा है। यहाँ तक कि यह डेमलर मर्सीडीज बेंज की स्मार्ट कार से भी छोटी होगी।
इस कार की फोल्डिंग फ्रेम को बनाने वाले डिजाइनर फ्रेंको वैरानी का कहना है कि यह औसत वाहन की पार्किंग से आठ गुना कम स्थान घेरेगा। यहाँ तक कि पार्किंग के दौरान इसे एक हुक के जरिए इलेक्ट्रिक ग्रिड से रीचार्ज भी कर सकेंगे।
उनके मुताबिक कार में रोबोटिक व्हील लगे होंगे, जो कम्प्यूटर के जरिए वाहन को नियंत्रित कर सकेंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि वे चाहते हैं कि इस कार का उत्पादन तीन से चार साल के बीच शुरू कर दिया जाएगा।
इस परियोजना के प्रमुख सलाहकार कहते हैं कि वे नहीं समझते कि यह कार स़ड़कों के लायक होगी। अभी यह केवल एक अवधारणा है और इसका प्रोटोटाइप तैयार है। यह नया विचार जरूर है, लेकिन इसके व्यावसायिक उत्पादन में अभी समय लगेगा।
सबसे आगे हिन्दुस्तानी... : दुनिया का ध्यान भले ही अब फोल्डिंग कार की ओर जा रहा हो, लेकिन भारत में प्रतिभा के धनी इस पर पहले ही काम कर चुके हैं। चंडीग़ढ़ में जून 2003 में वहाँ के श्री कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टैक्नालॉजी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र भूपिंदर, आशीष गोयल, वरुण गुप्ता, हरिंदर नेगी और रवि भारती पहले ही यह कार बना चुके हैं।
यह उनके अंतिम वर्ष के प्रोजेक्ट में शामिल थी। तब छात्रों ने कहा था कि वे एक ऐसा प्रोजेक्ट करना चाहते थे, जो आम आदमी के काम में आ सके। इसीलिए आम आदमी के काम आने वाली कार बनाई गई। यह भी ध्यान रखा गया कि कार आसानी से फोल्ड की जा सके।
साथ ही उसकी कीमत कम हो और वह छोटी सी हो। चूँकि दिल्ली और चंडीगढ़ में पार्किंग की समस्या काफी ज्यादा है इसी के मद्देनजर इन्होंने यह कार बनाई थी। कार को फोल्ड करने में सिर्फ पाँच मिनट लगते हैं। इसको फोल्ड करने की प्रक्रिया भी बहुत आसान है।
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