टेलीफोन के आविष्कारक के रूप में एलेक्जेंडर ग्राहम बेल को जाना जाता है, लेकिन इस उपलब्धि को अपने नाम कराने के लिए उन्हें अन्य कई वैज्ञानिकों के साथ पेटेंट की जंग लड़नी पड़ी थी।
28 दिसंबर 1871 को एंटोनियो म्यूसी नामक वैज्ञानिक ने अमेरिकी पेटेंट कार्यालय में साउंड टेलीग्राफर यंत्र को अपने नाम कराने के लिए आवेदन किया। आवेदन में उन्होंने कहा कि इस यांत्रिक व्यवस्था से एक तार के माध्यम से दो लोग आपस में बात कर सकते हैं।
उन्होंने इस यंत्र में और सुधार लाने के लिए धन की भी माँग की लेकिन इसके लिए उन्हें धन नहीं मिला। इसी बीच छह अप्रैल 1875 को एलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने भी अमेरिकी पेटेंट कार्यालय में ट्रांसमीटर्स एंड रिसीवर्स फॉर इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ यंत्र का पेटेंट अपने नाम कराने के लिए आवेदन कर दिया।
दूसरी ओर 11 फरवरी 1876 को एलिशा ग्रे नाम की वैज्ञानिक ने टेलीफोन के साथ एक ट्रांसमीटर का आविष्कार करने की बात कही। उन्होंने इसका पेटेंट माँगा और कहा कि टेलीग्राफिक सर्किट के जरिए दो व्यक्ति आपस में बात कर सकते हैं।
टेलीफोन का पेटेंट अपने नाम कराने के लिए वैज्ञानिकों में कागजी लड़ाई जारी थी और सभी इस कोशिश में लगे थे कि यह अभूतपूर्व उपलब्धि विज्ञान के इतिहास में उन्हीं के नाम लिखी जाए।
14 फरवरी 1876 को ग्राहम बेल ने पेटेंट के लिए एक और आवेदन कर दिया। इस पर अमेरिकी पेटेंट कार्यालय ने 19 फरवरी 1876 को इसकी जानकारी एलिशा ग्रे को दी और कहा कि दोनों में से किसे टेलीफोन का आविष्कारक माना जाए यह तय करना मुश्किल हो रहा है।
पेटेंट कार्यालय का पत्र मिलने पर एलिशा ग्रे पेटेंट की दौड़ से खुद ही बाहर हो गईं। आखिरकार सात मार्च 1876 को टेलीफोन का पेटेंट ग्राहम बेल के नाम हो गया। बेल ने 10 मार्च 1876 को अपने यंत्र का सफल प्रदर्शन किया और अपने मित्र वॉटसन को फोन कर कहा वाटसन यहाँ आओ। मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।
बेल के इस अविष्कार से वैज्ञानिक समुदाय चकित हो गया और तभी से 10 मार्च के दिन को विश्व टेलीफोन दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया।
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