क्या वाकई विश्व की अर्थव्यवस्था 2001 से भी बड़ी मंदी की ओर अग्रसर है? क्या शेयर बाजार की जो गिरावट हमने 18 से 21 जनवरी के बीच देखी थी, वो बस एक शुरुआत भर थी? क्या तगड़ी अर्थव्यवस्था के दावों के बावजूद अमेरिकी मंदी भारत को भी अपने आगोश में ले लेगी?
...ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो पूरे कॉरपोरेट जगत, खासतौर पर आईटी क्षेत्र से जुड़े लोगों को दिन-रात परेशान किए हुए हैं। खासतौर पर साफ्टवेयर इंजीनियर बहुत परेशान हैं।
वेतन में कटौती तो सभी बड़ी कंपनियाँ कर ही रही थीं, भविष्य को लेकर उनके माथे पर खिंची चिंता की लकीरें उस समय और गाढ़ी हो गईं जब टीसीएस और आईबीएम जैसी कंपनियों से क्रमश: 700 और 400 इंजीनियरों को निकाले जाने की बात सामने आई।
विशेषज्ञों का तो मानना है कि ये तो बस शुरुआत भर है, पहली तिमाही के परिणाम आने पर स्थिति और भी भयावह हो सकती है। तो क्या अब साफ्टवेयर इंजीनियरों के स्वप्नलोक में विचरने के दिन लद गए हैं? बहुत सारे लोगों का ये मानना रहा है कि आईटी क्षेत्र में मिलने वाली तनख्वाह दिन-रात एक मायाजाल रच रही है।
लगातार बढ़ती ये तनख्वाह यथार्थ से कोसों दूर है और ये सब बस एक फुगावा है, जिसका फूटना तय है। तो क्या ऐसे आकलन अब सच साबित हो रहे हैं? या ये केवल कुछ समय के लिए छाई मंदी है जो शीघ्र ही दूर हो जाएगी? इस मुश्किल समय में साफ्टवेयर इंजीनियरों को क्या करना चाहिए? आप इस सबके बारे में क्या सोचते हैं? क्या आने वाले समय में और भी अधिक छँटनी होगी?
बहस में भाग लीजिए और आपके सुझाव दीजिए -
|