किफायत और पर्यावरण हितैषी होने का मूलमंत्र अब टैक्नोलॉजी कंपनियों ने भी अपना लिया है। इनमें विप्रो ने तेजी से अमल भी शुरू कर दिया है।
कभी-कभी तो विप्रो जैसी कंपनी में यह अहसास होता है कि कहीं यह सरकारी दफ्तर तो नहीं। धूल से सना और सलवटों वाला लिफाफा इधर से उधर दफ्तर में घूम रहा है और यह देखकर कोई नहीं कहेगा कि यह देश की दिग्गज आईटी कंपनी का दफ्तर है, लेकिन विप्रो इसके लिए अपने कर्मचारियों को प्रोत्साहित कर रही है।
हालाँकि अभी तक कम्प्यूटर कंपनियों को पर्यावरण का दुश्मन माना गया था, लेकिन अब इन्होंने हरीतिमा को ब़ढ़ाने के लिए कमर कस ली है और कर रही हैं ये कागज का कम से कम उपयोग किया जा रहा है। चाय पीने के कप पहले कागज के हुआ करते थे और ये पानी पीने के स्थान पर रखे रहते थे, उसे बंद कर दिया गया है।
कचरे की पेटी की जगह रिसाइकलिंग बिन्स लगाई जा रही हैं। जहाँ तक ए4 साइज के कागज की बात है तो पहले आईटी कंपनियों में इसका एक ओर से ही उपयोग होता था, लेकिन अब दोनों ओर से भारी पैमाने पर किया जाने लगा है।
बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अलग तरह का अभियान चला रखा है। नागरहोल जैसे आदिवासी इलाके में कंपनी ने एक एनजीओ नितयत से करार कर लिया है, जिसके तहत उन कागजों की नोटबुक बनाकर गरीब बच्चों को दी जाती है, जो कागज दफ्तर में एक बार काम में लिए जा चुके हैं।
इस इलाके में पौधारोपण भी कंपनी की ओर से किया जा रहा है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक बंगलोर में आईटी कंपनियाँ हर साल 8000 से 10,000 टन का कचरा निकालती हैं। इसमें से 30 प्रश इलेक्ट्रिकल उपकरण खराब हो जाते हैं। इकॉनॉमिक टाइम्स के मुताबिक इससे निपटने के लिए आईटी कंपनियाँ पूर्णतः ई-वेस्ट डिस्पोजल को अपनाने लगी हैं। इसमें जंग खाए लोहे के बॉक्स, ड्राय सेल, फ्लॉपी और पुराने कार्टेजेस का पूरी तरह से निराकरण किया जाता है।
|