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- निर्मला भुराड़िया

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'पंख होती तो उड़ आती रे, तुझे दिल का दाग दिखलाती रे...' पुरानी फिल्म सेहरा के इस गीत में विरही नायिका बहुत दूर गए नायक से मिलकर मन की बात कह पाने की चाहत में यह गीत गा रही है। आज तकनीकी ने यह गीत सच कर दिया है। नायिका को तो नहीं उसके शब्दों को जरूर पंख लग गए हैं, और वे पलक झपकते ही या कहो उँगलियाँ खटकाते ही पत्र बन जाते हैं। अंतरिक्षी-डाकिया उन्हें यहाँ से वहाँ पहुँचा देता है। नायक-नायिका ही क्यों हर रिश्ते, हर तरह की मित्रता के लिए, हर तरह के संदेश के लिए वर्ल्ड वाइड वेब एक चमत्कारिक साधन बन चुका है। इस पर ई-मेल जैसी औपचारिक सुविधा ही नहीं, सोशल नेटवर्किंग का भी प्रावधान है।

फेसबुक, ऑरकुट, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर करोड़ों लोग हैं, जहाँ वे रोज एक-दूसरे से हैलो-हाय करते हैं। रुचियों, विचारों, तस्वीरों और जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं। इन सोशल साइट्स के जरिए माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन, मित्र-संबंधी, आपको जानने वाले तो जुड़े ही रहते हैं, नए रिश्ते भी बनते हैं।

वैचारिक समानता या समान रुचियों के आधार पर नए मित्र भी बनते हैं। मित्रों के मित्र भी आपके समूह में जुड़ जाते हैं। तो कभी-कभी अर्से से न मिल रहे पुराने मित्र भी संपर्क में आ जाते हैं या ढूँढ निकाले जाते हैं। लोगों से जुड़े रहने का, कम्यूनिकेट करने का यह अद्भुत माध्यम है। आज के युवाओं में बेहद लोकप्रिय, लोगों को जोड़ने की इस माध्यम की ताकत को पहचान कर फेसबुक नामक सोशल साइट ने एक नई पहल की है। वे इसका उपयोग दोस्ती के लिए ही नहीं, शांति के लिए, विश्व शांति के लिए भी करने की एक योजना लाए हैं।

फेस बुक और स्टेनफोर्ड की परसुएसिव टेक्नोलॉजी लैब ने peace.facebook.com नामक प्रोजेक्ट लॉन्‍च किया है। इसके माध्यम से विश्व के उन भागों की जनता एक-दूसरे से मित्रता बढ़ाएगी, जिनमें सदियों से आपसी विद्वेष पल रहा है। इसके माध्यम से यहूदियों-मुस्लिमों, तुर्क-ग्रीक्स, हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी, इसराइली-फिलिस्तीनी आदि में मित्रता और वार्तालाप को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके पीछे का दर्शन यही है कि संप्रेषण से गलतफहमियाँ दूर होती हैं, वार्तालाप से दोस्ती बनती है, क्षमा से भीतर पड़ी गाँठ खुलती है। विभिन्न धर्मों में ईद मिलन, दीपावली मिलन, क्षमावाणी आदि के जरिए यह सालाना स्तर पर होता आया है। अब तकनीकी बगैर किसी धार्मिक प्रयोजन के इसे रोज करेगी।

हालाँकि तकनीकी अभी सर्वसुलभ नहीं है। यह भी सच है कि ई-मेल स्पर्श और आलिंगन का विकल्प नहीं हो सकता, न ही हाड़-माँस के इंसान से मिलने और आई-कांटेक्ट का, फिर भी यह अपनों से विरह की मजबूरी और संप्रेषण के बिलकुल टूट जाने से बेहतर है। दूर देश में रहने वाले अपनों का ई-खत ही बहुत बड़ा संबल होता है।

हाँ, एक बुरा पहलू सोशल नेटवर्किंग साइट्स का यह हो सकता है या है कि इसकी लत लग जाए तो फिर यह बहुत समय बर्बाद करता है। शारीरिक व्यायाम वाले खेलों और गतिविधियों से विमुख करता है। तो यही कहा जा सकता है कि अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है। अति से बचने का उपाय संपूर्ण रस-निषेध नहीं, संयम और संतुलन है।
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