- डॉ. विजय अग्रवाल आप यह मत सोचिए कि मैं आपको क्रूर होना सिखा रहा हूँ। यह मत समझिए कि मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि ममता को छोड़ो। ममता तो मनुष्य का सार है। उसे भला कैसे छोड़ा जा सकता है। लेकिन यहाँ मैं जिस निर्ममता की बात कर रहा हूँ, वह निर्ममता दूसरों के प्रति नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति की निर्ममता है। अक्सर हम सभी अपने प्रति बहुत कोमल रवैया रखते हैं। हम अपने को सही समझते हैं और बेचारा भी समझते हैं।
इसलिए हम अपने प्रति सख्त रवैया नहीं अपना पाते। माँ-बाप अक्सर अपनी सबसे छोटी संतान को लगातार माफ करते चलते हैं। इसीलिए सबसे छोटी संतान अधिकांशतः नकचढ़ी पाई गई है। इसी प्रकार हम स्वयं को माफ करके चलते रहते हैं और नतीजे में खुद का बिगाड़ कर लेते हैं।
यहाँ निर्ममता से मेरा मतलब समय को निभाने के प्रति निर्ममता से है। आपने फैसला किया है कि सुबह 5 बजे उठना है, तो सुबह 5 बजे उठना ही है, फिर चाहे कितनी भी नींद क्यों न आ रही हो। आपने किसी को 5 बजे मिलने का समय दिया है। आपको उससे मिलने 5 बजे पहुँचना ही है, फिर चाहे आपके सिर में दर्द हो रहा हो या बारिश हो रही हो। पहुँचना है, मतलब पहुँचना है। | | आप यह मत सोचिए कि मैं आपको क्रूर होना सिखा रहा हूँ। यह मत समझिए कि मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि ममता को छोड़ो। ममता तो मनुष्य का सार है। उसे भला कैसे छोड़ा जा सकता है। लेकिन यहाँ मैं जिस निर्ममता की बात कर रहा हूँ, वह निर्ममता दूसरों के प्रति नहीं। |
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बहाना बनाकर पहुँचने से बचना नहीं है। और यदि कभी ऐसा कर भी लिया, तो फिर कुछ देर के लिए खुद के ही न्यायाधीश भी बन जाइए। अपने इस निर्णय के बारे मेंफैसला सुनाइए और दी गई सजा को भुगतिए भी।
आप पढ़ रहे हैं। पढ़ना चाहते हैं। आपका कोई दोस्त आपसे मिलने आ गया। अब आप क्या करेंगे? क्या आप इतने कठोर बन सकते हैं कि उसे कह दें कि 'दो घंटे बाद आना।' मैं जानता हूँ कि आप नहीं कह सकते। इसके दो कारण हैं। पहला आपका यह भय कि दोस्त नाराज हो जाएगा। दूसरा यह कि आप भी यही चाहते हैं कि पढ़ने से मुक्ति मिल जाए। यदि आप अपने इन दो घंटों को बचाना चाहते हैं, तो निश्चित रूप से आपको कठोर बनना पड़ेगा। अपने दोस्त के प्रति और अपने प्रति भी सख्त रवैया अपनाना पड़ेगा।
आपको हमेशा यह सिखाया गया है कि दूसरों की बातें मानो। यह अच्छा गुण है और बहुत अच्छा गुण है। लेकिन समय के मामले में यह गुण उपयोगी नहीं रह पाता। यहाँ आपको थोड़ी व्यावहारिक नीति अपनानी पड़ेगी। यहाँ अपने अंदर 'ना कहने' की आदत डालनी पड़ेगी। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिसने जब जो कह दिया, अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर उसी काम को करने लगे।
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