- अजीम प्रेमजी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी- विप्रो यह दिक्कत अमूमन सारी कंपनियों के सामने रहती है कि लोग अच्छे वेतन या प्रोफाइल के चक्कर में उनकी कंपनी को अलविदा कह जाते हैं। इस साल की शुरुआत में एक सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर मार्क को एक ख्यातिप्राप्त अंतरराष्ट्रीय फर्म से उसके भारतीय ऑपरेशंस के लिए, जो कि विशेष सॉफ्टवेयर विकसित कर रही है, काम करने का प्रस्ताव मिला जिसे पाकर वह झूम उठा।
उसने सीईओ के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। उसे दिया जाने वाला वेतन भी शानदार था। कंपनी की कार्यप्रणाली दुरुस्त थी। वहाँ कर्मचारियों के लिए मित्रवत मानव संसाधन (एचआर) नीतियाँ बाकायदा लागू थीं। चमचमाता ऑफिस था, जहाँ प्रत्येक श्रेष्ठतम प्रौद्योगिकियों को अपनाया गया था। यहाँ तक कि कैंटीन में परोसा जाने वाला खाना तक लाजवाब था। कंपनी की ओर से दो बार मार्क को प्रशिक्षण के लिए विदेश भेजा गया था। कंपनी ज्वॉइन करते ही उसने कहा कि मेरे सीखने की प्रवृत्ति हमेशा से तेज रही है। पिछले सप्ताह उस कंपनी कोज्वॉइन किए कोई 7-8 महीने ही हुए थे कि मार्क ने उस कंपनी को गुडबॉय कह दिया। आखिर वह प्रतिभावान कर्मचारी क्यों कंपनी छोड़कर चला गया?
मार्क ने भी उसी कारण से अपनी कंपनी का साथ छोड़ा जिस कारण से कई अच्छे कर्मचारी सब कुछ मिलने के बाद अपनी कंपनी से रुखसत हो जाते हैं। इसका उत्तर 'गैलप ऑर्गेनाइजेशन' द्वारा किए गए सबसे बड़े अध्ययन में मिलता है। इस अध्ययन के दौरान 10 लाख कर्मचारियों तथा 80 हजार प्रबंधकों का सर्वेक्षण किया गया तथा इसे 'फर्स्ट ब्रेक ऑल द रुल्स' नामक पुस्तक में प्रकाशित किया गया था। इसमें कुछ आश्चर्यजनक बातें सामने आई थीं-
'यदि आप अच्छे लोगों को खो रहे हैं तो उनके इमिजिएट बॉस को देखिए। इमिजिएट बॉस ही इसका कारण है जिनके कारण कर्मचारी कंपनियों में टिके रहते हैं या छोड़कर चले जाते हैं। और वह ही कारण है कि लोग क्यों चले गए। जब लोग कंपनी छोड़ते हैं तो अपने इमिजिएट बॉस का ज्ञान, अनुभव तथा उसके संपर्कों को हथिया लेते हैं और सीधे उनसे प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं।'
लेखकद्वय मार्कर्स बकिंघम और कर्ट कॉफमैन ने लिखा है-'लोग मैनेजरों को छोड़ते हैं न कि कंपनियाँ!'
अधिकांश मामलों में वह मैनेजर ही होते हैं, जो लोगों को दूर भगाते हैं। एचआर एक्सपर्ट कहते हैं कि सारी बुराइयों में से कर्मचारियों को शोषण सबसे असहनीय बुराई लगती है। पहली बार कोई कर्मचारी नहीं छोड़ेगा, लेकिन उसके दिमाग में इस बारे में एक विचार अवश्य पनपने लगता है। दूसरी मर्तबा उस विचार को खाद-पानी मिलने लगता है और तीसरी मर्तबा वह दूसरा काम तलाशने लगता है।
जब लोग खुलेआम अपना गुस्सा जगजाहिर नहीं कर सकते, तब वह अप्रत्यक्ष आक्रामकता द्वारा इसे प्रदर्शित करते हैं। वे खड़े-खड़े अपनी एड़ियों से जमीन पर गड्ढेखोदने का यत्न करते दिखाई देते हैं। फिर धीरे-धीरे ठंडे पड़ जाते हैं। वे केवल वही करते हैं, जो उनसे करने को कहा जाता है- न इससे कम और न इससे ज्यादा। ऐसा न करके वे बॉस को यह महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं कि काम में आपका दिल और आत्मा नहीं है।
अलग-अलग मैनेजर अलग-अलग तरीके से कर्मचारियों को तनाव में डालते हैं। या तो वे उन पर जरूरत से ज्यादा नियंत्रण करते हैं या उन्हें संदेह की नजर से देखते हैं। और कुछ नहीं तो बात-बात पर उन्हें दबाते हैं या बहुत ज्यादा आलोचना करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि कर्मचारी कोई स्थायी संपत्ति नहीं है। वह मुक्त अभिकर्ता है। जब यह सिलसिला ज्यादा लंबा खिंच जाएगा तो कर्मचारी छोड़कर तो जाएगा ही फिर मामला चींटी जितनी छोटा ही क्यों न हो।
याद रखें : प्रतिभावान लोग ही छोड़कर जाते हैं, ठूँठ तो एक जगह ही खड़े रहते हैं!
|