अशोक वाटिका में उत्पात मचा रहे हनुमान को नागपाश में बाँधकर मेघनाद रावण के भव्य दरबार में ले आया। वहाँ बड़े-बड़े योद्धाओं से घिरा दशानन एक ऊँचे स्वर्ण सिंहासन पर बैठा था। हनुमान को निर्भय देख वह गरजती आवाज में बोला- अरे वानर, तू कौन है? तूने मेरे बारे में नहीं सुना, जो ऐसे खड़ा है। हनुमान- मैं संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी श्रीराम का दूत हूँ, जिनकी पत्नी का तूने हरण किया है। उन्हें वापस करने में ही तेरा और तेरे परिवार का कल्याण है। रावण- लगता है तेरी मृत्यु निकट है। हनुमान- मेरी नहीं तेरी मृत्यु मुझे दिखाई देती है। यह सुनते ही रावण आग बबूला हो उठा। उसने अपने सैनिकों को हनुमान को मारने का आदेश दिया। इस पर विभीषण बोले कि दूत का वध नीति सम्मत नहीं। तब रावण सैनिकों से बोला- बंदर को अपनी पूँछ पर बहुत घमंड होता है। तुम इसकी पूँछ पर घी-तेल में भीगे कपड़े लपेटकर लंका की गलियों में घुमाओ और फिर आग लगा दो। जब हनुमान को लंका की गलियों में घुमाया जा रहा था तो उनकी दशा देखकर लंकावासी बड़े आनंदित हो रहे थे। अंततः उनकी पूँछ में आग लगा दी गई। वे तुरंत बंधनमुक्त होकर एक ऊँचे महल की अटारी पर जा बैठे। इसके बाद एक महल से दूसरे महल की छत पर कूद-कूदकर उनमें आग लगाने लगे। देखते ही देखते पूरी लंका आग की लपटों में घिर गई। चारों तरफ हाहाकार मच गया। अपने महल से यह दृश्य देख रहा बेबस रावण जल-भुनकर कोयला हो रहा था और अपनी सोने की लंका को राख होते देख रहा था। अपना काम पूरा करने के बाद हनुमान ने समुद्र में छलाँग लगाकर पूँछ की आग बुझा ली और सीताजी से मिलकर लौट गए। |
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