एक महिला प्रतिदिन नाग देवता के चित्र पर पुष्प चढ़ाती और अक्षत-कुंकुम से उनकी पूजा कर उनसे अपने घर में सुख-समृद्धि की कामना करती। उसकी भक्ति से प्रसन्ना होकर नाग देवता एक दिन उसके घर पहुँच गए।
आँगन में झाड़ू लगाते समय जब उसकी दृष्टि घर आए नागदेव पर पड़ी, तो वह घबरा गई और झाडू लहराकर उन्हें भगाने की कोशिश करने लगी। लेकिन नाग देवता टस से मस भी नहीं हुए और अपना फन फैलाए बैठे रहे।
उसके जोर-जोर से चिल्लाने के कारण कुछ ही देर में घर के सभी लोग वहाँ इकट्ठा हो गए। वह बोली- अरे, खड़े क्या हो। कितना भयंकर साँप है। इसका काटा तो पानी भी न माँगे। इससे पहले कि यह किसी को डस ले, लाठी लेकर इसे मार भगाओ। इस पर परिवार के लोग लाठियाँ ले आए। इस बीच उसकी बातों से आहत नाग देवता अप्रसन्न होकर वहाँ से चले गए। | | एक महिला प्रतिदिन नाग देवता के चित्र पर पुष्प चढ़ाती और अक्षत-कुंकुम से उनकी पूजा कर उनसे अपने घर में सुख-समृद्धि की कामना करती। उसकी भक्ति से प्रसन्ना होकर नाग देवता एक दिन उसके घर पहुँच गए। |
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कुछ दिन बाद जब नागपंचमी आई, तो वह महिला पूजा की थाली सजाए गाँव के बाहर बनी नाग की बाँबी के पास पहुँची। पूजा करने के बाद उसने दूध से भरा मिट्टी का सकोरा वहाँ रख दिया और बाँबी को प्रणाम करके लौट आई।
दोस्तो, ऐसी ही परिस्थिति के लिए एक कहावत है कि 'घर आए पूजें नहीं, बाँबी पूजन जाएँ।' यह बात बिलकुल सही है।
हम अपने घर आए व्यक्ति को पूछते नहीं या यूँ कहें कि अगर कोई आगे रहकर हमारे पास आता है, तो हम उसकी कद्र नहीं करते हैं। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, हमारे कितने ही काम का क्यों न हो और वह हमारी सहायता करने ही क्यों न आया हो। तब हमें उसकी नीयत में कोई खोट, कोई स्वार्थ, कोई गरज नजर आती है। और हम उसकी भावनाओं, उसकी सकारात्मक सोच को बिना समझे उसे दुत्कार देते हैं, चलता कर देते हैं।
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