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वह व्यक्ति है विचित्र जिसका नहीं है कोई मित्र Search similar articles
मनीष शर्मा
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अत्यंत गरीबी में दिन गुजार रहे सुदामा के परिवार को कई बार भूखे पेट ही सोना पड़ता था। इसके बावजूद वे किसी से कुछ नहीं माँगते थे। एक बार उनकी पत्नी हिम्मत करके बोली- स्वामी, द्वारिकाधीश कृष्ण आपके मित्र हैं। उनके पास जाकर तो देखें, वे जरूर हमारी सहायता करेंगे।

सुदामा- तुम्हारी बात सही है, लेकिन अब वह बचपन के सखा को पहचानेगा भी या नहीं। बाद में पत्नी के जोर देने पर वे इस शर्त पर जाने के लिए तैयार हो गए कि वे माँगेंगे कुछ नहीं। जाते समय पत्नी ने कृष्ण को भेंट करने के लिए थोड़ा-सा चिवड़ा एक पोटली में बाँधकर सुदामा को दे दिया। उसे लेकर वे द्वारिका पहुँच गए।

राजमहल पहुँचकर उन्होंने कृष्ण से मिलने की इच्छा द्वारपाल को बताई तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि यह फटेहाल ब्राह्मण कृष्ण का मित्र हो सकता है। फिर भी उसने कृष्ण को जब यह खबर दी तो वे सुध-बुध खोकर नंगे पाँव द्वार की ओर भागे और सुदामा को हृदय से लगा लिया।

बाद में खुद अपने हाथों से सुदामा के फटे पैर धोकर उनकी थकान मिटाने के बाद बोले- मित्र, मेरे लिए क्या भेंट लाए हो? इस पर सुदामा पोटली छिपाने लगे। बालसखा का ऐश्वर्य देखकर उन्हें वह भेंट देने की उनकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी। लेकिन कृष्ण ने उस पोटली को देख लिया और उसे छीनकर उसमें से एक मुट्ठी चिवड़ा लेकर खाने लगे।

दूसरी मुट्ठी खाने से पहले ही रुक्मिणी ने उन्हें रोक दिया क्योंकि एक मुट्ठी से ही सुदामा के दोनों लोक सुधर चुके थे। अगले दिन सुदामा कृष्ण से बिना कुछ माँगे घर लौट गए। जब वे घर पहुँचेतो वहाँ अपनी कुटिया की जगह एक महल खड़ा देखकर उन्हें समझते देर न लगी कि उनके मित्र ने बिना कुछ माँगे ही बहुत कुछ दे दिया है।
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