एक सेठ अपने नगर के बाहर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवा रहा था। इस काम में बहुत से कारीगर दिन-रात लगे रहते थे। एक बार कुछ कारीगर लकड़ी के बड़े लट्ठे को फाड़ रहे थे। लट्ठा मोटा था, इसलिए उन्हें उसमें फच्चर फँसाना पड़ रहा था। इस बीच उनके दोपहर के भोजन का समय हो गया, इसलिए वे उस लट्ठे को वैसा ही छोड़कर चले गए। वहाँ पास ही बंदरों का एक झुंड रहता था। कारीगरों के चले जाने पर कुछ बंदर उधर आकर मस्ती करने लगे। उनमें से एक युवा बंदर बहुत ही ऊधमी था।
उसकी नजर फच्चर वाले लट्ठे पर पड़ी। वह अपने साथियों को अपनी ताकत दिखाने के लिए फच्चर पर चढ़कर उसे जोर-जोर से हिलने-डुलाने लगा। इस बीच एक वृद्ध बंदर ने उसे ऐसा न करने के लिए चेताया, लेकिन उसने बात अनसुनी कर दी। जब उसके दूसरे साथियों ने उसे समझाने की कोशिश की तो वह बोला- तुम मेरी ताकत को देखकर जल रहे हो। इसके बाद वह और भी ताकत लगाकर उस फच्चर को जोर-जोर से हिलाने लगा। अचानक फच्चर खिसक गया और बंदर लट्ठे में फँस गया। उसके शरीर पर इतनी गहरी चोटें आईं कि वह थोड़ी ही देर में छटपटा कर मर गया।
| | जब हम इस बात के पीछे के मनोविज्ञान पर गौर करेंगे तो देखेंगे कि बचपन से ही हर बच्चे का सपना होता है कि वह जल्दी से बड़ा हो जाए और फिर आजाद पंछी की तरह जो मन में आए करे। |
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दोस्तो, हर उम्र का अपना मिजाज, अपना मजा होता है। लेकिन यह मजा इस तरह भी नहीं लिया जाना चाहिए कि मजा किरकिरा हो जाए। जैसे कि उस बंदर के ऊधम ने उसका दम ही निकाल दिया। इसी तरह कई किशोर और युवक जिंदगी को हँसी-खेल समझकर उससे खेलते रहते हैं और इस चक्कर में उनके ही खेल लग जाते हैं।
इसके बावजूद वे जानते-बूझते ऐसी हरकतें करते रहते हैं, ऊधम मचाते रहते हैं और अंततः नुकसान उठाते हैं। कई बार तो उनकी जान पर भी बन आती है। जब हम इस बात के पीछे के मनोविज्ञान पर गौर करेंगे तो देखेंगे कि बचपन से ही हर बच्चे का सपना होता है कि वह जल्दी से बड़ा हो जाए और फिर आजाद पंछी की तरह जो मन में आए करे।
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