महान ब्रिटिश नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ को एक दिन उनकी किसी परिचित महिला ने पार्टी में बुलाया। शॉ ने अपनी व्यस्तता के चलते पहले तो काफी आनाकानी की, लेकिन महिला की जिद पर आखिर उन्होंने हामी भर दी। काम की व्यस्तता के बीच वे पार्टी के बारे में भूल गए।
अचानक उन्हें ध्यान आया कि पार्टी का समय हो चुका है, तो वे सीधे उठकर उस महिला के घर पहुँच गए। उन्हें देखकर महिला का चेहरा खिल गया, लेकिन जैसे ही उसकी नजर उनके कपड़ों पर पड़ी, वह खिन्न होकर बोली- आप ये कैसे कपड़े पहनकर आ गए। शॉ बोले- मुझे कपड़े बदलने का समय ही नहीं मिला, इसलिए ऐसे ही चला आया।
क्या फर्क पड़ता है। महिला बोली- नहीं-नहीं, मैंने पार्टी में एक से बढ़कर एक लोग बुलाए हैं। ऐसे में ये कपड़े नहीं चलेंगे। प्लीज, आप घर जाकर जल्दी से कपड़े बदल आइए। ये मेरी इज्जत का सवाल है। शॉ को महिला की यह जिद भी मानना पड़ी और वे घर से अच्छी तरह सूटेड-बूटेड होकर आ गए। इसके बाद पार्टी में जब खाने का समय आया तो वे खाना खुद खाने की बजाय कपड़ों पर पोतने लगे। हैरान लोगों ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो वे बोले- आज का खाना मुझे इन्हीं कपड़ों की वजह से नसीब हुआ है, इसलिए इन्हें खिला रहा हूँ। यह सुनकर उस महिला का सिर शर्म से झुक गया।
दोस्तो, अब ऐसे व्यक्ति के यहाँ क्या जाना, जिसके लिए आप नहीं, आपका पहनावा ज्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन विडंबना यह है कि व्यक्ति की हैसियत का आकलन इसी ऊपरी दिखावे से किया जाता है। कथित हाई सोसाइटी की पार्टियों में तो यह रोजमर्रा का काम है, जिनमें कि लटक-झटक के आधार पर ही व्यक्ति की पूछ-परख होती है।
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