एक बार बीरबल दरबार में देर से पहुँचे। अकबर ने इसका कारण पूछा तो वे बोले-हुजूर, बच्चे की जिद पूरी करने में लगा था, इसलिए देर हो गई। अकबर- क्या तुम बच्चे को बहला-फुसलाकर जल्दी नहीं आ सकते थे?
बीरबल- जहाँपनाह, बच्चे जिद पकड़ लें, तो ब्रह्मा भी उन्हें मना नहीं सकते। अकबर- बच्चों जैसी बात मत करो। बीरबल- यदि आपको मेरी बात पर यकीन नहीं तो खुद आजमा कर देख लें। अकबर ने चुनौती मंजूर कर ली। इसके बाद एक बच्चे को दरबार में बुलाया गया।
अकबर उससे प्यार से बातें करने लगे। जब उन्होंने बच्चे से पूछा कि क्या खाओगे, तो बच्चा बोला- गन्ना। अकबर के आदेश पर एक सेवक तुरंत गन्ने की छोटी-छोटी गंडेरियाँ तश्तरी में सजाकर ले आया। बच्चे ने उन्हें लेने से मना कर दिया और साबुत गन्ना माँगने लगा। | | एक बार बीरबल दरबार में देर से पहुँचे। अकबर ने इसका कारण पूछा तो वे बोले-हुजूर, बच्चे की जिद पूरी करने में लगा था, इसलिए देर हो गई। अकबर- क्या तुम बच्चे को बहला-फुसलाकर जल्दी नहीं आ सकते थे? |
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तब उसे साबुत गन्ना लाकर दिया गया, लेकिन उसने लेने से इंकार करते हुए कहा- मुझे तो वही गन्ना साबुत चाहिए, जिसकी गंडेरियाँ बनाई गई थीं। अकबर- यह कैसे हो सकता है। इस पर जिद पकड़कर बच्चा जोर-जोर से रोने लगा।
अकबर ने उसे तरह-तरह से बहलाया-फुसलाया, उसे गाड़ी भरकर गन्ना देने का लालच दिया, लेकिन वह मानने की बजाय और जोर-जोर से रोने लगा। अंततः हार मान कर अकबर बोले- वाकई बच्चे को समझाना टेढ़ी खीर है।
दोस्तो, बच्चों की जिद की कोई जद नहीं होती। वह किसी भी बात पर अड़ सकता है, अकड़ सकता है। तब आप उसे लाख समझाएँ-मनाएँ, बहलाएँ-फुसलाएँ, आपकी एक नहीं चलेगी, क्योंकि बच्चे स्वार्थी, लालची नहीं होते, जो आपके बहलाने-फुसलाने में आ जाएँ।
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