सन् 1988 के सिओल ओलिंपिक में पुरुष वर्ग का 100 मीटर की रेस का फाइनल शुरू होने वाला था। पिछले ओलिंपिक में चार स्वर्ण पदक जीतकर तहलका मचाने वाले कार्ल लेविस के माथे पर उस समय चिंता की हल्की-सी लकीरें थीं, क्योंकि एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने अपने पिता और कोच विलियम लेविस को खो दिया था, जिनके कारण आज वे इस मुकाम पर थे।
पिता को दफनाते समय कार्ल ने 100 मीटर की रेस में जीता ओलिंपिक स्वर्ण पदक उनकी मुट्ठी में रखकर माँ इवलिन लेविस को वचन दिया था कि अगले ओलिंपिक में वे पूरा दम लगाकर फिर से स्वर्ण पदक जीतकर लाएँगे। लेकिन उनकी राह में रोड़ा था कनाडा का धावक बेन जॉनसन, जो कि पिछले वर्षों में उन्हें 100 मीटर में कई बार पछाड़ चुका था। आखिर रेस शुरू हुई।
जॉनसन ने शुरुआत में ही बढ़त ले ली। खराब शुरूआत के साथ लेविस 30 मीटर तक तीसरे स्थान पर थे। इसके बाद उन्होंने रफ्तार पकड़ी, लेकिन पूरा दम लगाने के बाद भी वे जॉनसन से 2 मीटर से पिछड़ गए। जॉनसन ने 9.79 सेकंड का नया विश्व रिकार्ड बनाकर यह रेस जीत ली। लेविस ने 9.92 सेकंड का समय लिया।
प्रतियोगिता के तीसरे दिन जॉनसन को स्टीरॉइड्स के इस्तेमाल में पकड़ा गया। गोल्ड मेडल छीनकर लेविस को दे दिया गया तथा उनके समय को ही नया ओलिंपिक रिकॉर्ड माना गया। इसके बाद अपनी माँ की हथेली में मेडल रखते समय लेविस भावुक हो उठे।
दोस्तो, कहते हैं कि जिंदगी एक दौड़ है। इस दौड़ में अंततः विजेता वही होता है जो पूरे दमखम, पूरी तैयारी से दौड़ता है। कार्ल लेविस ने एक बार अपनी सफलता का राज बताते हुए कहा था- 'किसी भी बड़ी दौड़ से पहले मैं ज्यादा नहीं सोचता।
मैं खुद से कहता हूँ कि शांत भाव से खुद की दौड़ दौड़ो। अपनी सारी ऊर्जा एक जगह फोकस करके दौड़ जाओ। यदि तुम ऐसा करोगे तभी जीतोगे।' उनकी इस बात में दम है। जो ऐसा करता है, वह वाकई जीतता है, क्योंकि उसका दिमाग इधर-उधर नहीं चलता।
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