योगिनी एकादशी की कथा है कि कुबेर प्रतिदिन एक तय समय पर बिना चूक के शिव की पूजा-अर्चना करते थे। पूजा के लिए फूल लाने की जिम्मेदारी उन्होंने अपने निकटस्थ हेममाली को सौंप रखी थी। एक बार वह नियत समय पर फूल लेकर नहीं पहुँचा। जब दोपहर तक न तो वहआया और न ही उसकी कोई सूचना, तो क्रोधित कुबेर ने अपने एक सेवक को उसे ढूँढने भेजा।
सेवक ने हेममाली के घर पहुँचकर देखा कि वह अपनी पत्नी के साथ प्रेम में लीन था। इसका पता चलने पर कुबेर ने हेममाली को तुरंत बुला भेजा। उसे देखकर क्रोध से काँपते कुबेर बोले- नीच! कामी! आज तेरे कारण मैं अपने भोलेनाथ की पूजा नहीं कर पाया।
मैं तुझे शाप देता हूँ कि तुझे अपनी स्त्री का वियोग सहना पड़ेगा और तू मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी बन जाएगा। इस तरह हेममाली कोढ़ी बनकर धरती पर दर-दर की ठोकरें खाने लगा।
एक दिन भटकते हुए वह ऋषि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँचा। ऋषि के पूछने पर उसने अपनी दुर्दशा का कारण पूरी सत्यता से बताया। तब ऋषि बोले- निश्चित ही तूने बड़ा अपराध किया है। लेकिन तेरी सत्यता से प्रसन्न होकर मैं तुझे इससे मुक्ति का उपाय बताता हूँ। योगिनी एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करने पर तुझे मुक्ति मिल जाएगी। हेममाली ने वैसा ही किया और वह पहले जैसा रूपवान हो गया।
दोस्तो, हंगेरियन कहावत है कि एक लापरवाह की पत्नी विधवा समान होती है। हेममाली की पत्नी ने भी अपने पति की लापरवाही की सजा भुगती। लापरवाह व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि उसकी चूक की सजा उसके साथ ही उसके अपने भी भुगतते हैं। कई लोग हेममाली की तरह अपने दायित्वों या ड्यूटी को ठीक से नहीं निभाते।
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