सवा साल की उम्र में मस्तिष्क ज्वर के कारण देखने और सुनने की क्षमता खोने के बावजूद एक लड़की बड़ी होकर विश्वप्रसिद्ध लेखिका और लेक्चरर बन जाए तो यह अजूबा ही है ना! यह अजूबा थी हेलेन कीलर।
जिस उम्र में बच्चा कुछ सीखना शुरू करता है, उसी उम्र में उसकी दुनिया में अँधेरा और सन्नाटा छा गया। वह अंदर ही अंदर घुटती, लेकिन शब्दों के अभाव में वह अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाती। सात साल की उम्र में उसके माता-पिता ने एक कठोर अनुशासनप्रिय और दृढ़निश्चयी प्रशिक्षिका एनी सुलियन के हाथों उसे सौंप दिया।
एनी ने उसे सिखाया कि वह हाथों के द्वारा शब्दों को कैसे व्यक्त करे। लेकिन एक समस्या थी कि वह शब्द तो सीख गई, लेकिन उनके अर्थ नहीं जान पा रही थी। एक दिन घर के बाहर बने फव्वारे में उसका हाथ पड़ा। तभी एनी ने उसके हाथ पर लिखा 'वॉटर।' पहली बार उसने किसी शब्द का मतलब समझा। उस दिन हेलेन ने 30 नए शब्द और उनके अर्थ सीखे।
उसके बाद एनी के ओंठों पर हाथ लगा-लगाकर शब्दों का उच्चारण सीखा। इस प्रक्रिया में उसे कठिनाई तो बहुत होती थी, लेकिन उसने हिम्मत हारना तो सीखा नहीं था। अपने इसी जज्बे से उसने फ्रेंच, जर्मन, ग्रीक और लेटिन भाषाएँ भी ब्रेल पद्धति के माध्यम से सीखीं। बीस साल की उम्र में उसने रेडक्लिफ कॉलेज में दाखिला लिया और स्नातक होकर ही दम लिया।
इस बीच हेलेन की पहली पुस्तक 'द स्टोरी ऑफ लाइफ' प्रकाशित होकर 50 भाषाओं में अनुवादित भी हो चुकी थी। उसने इसके अलावा दस और पुस्तकें एवं दुनियाभर के लेख भी लिखे। 1940 में वह लेक्चरर बनी और अपने जैसे लोगों की सहायता के लिए दुनियाभर में घूम-घूमकर काम करने लगी। अगर हेलेन नहीं होतीं तो दुनिया के मूक-बधिर और दृष्टिहीन बच्चों को आज जैसी शिक्षा नहीं मिल पाती।
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