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कभी बंद नहीं होते संभावनाओं के द्वार  Search similar articles
मनीष शर्मा
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सन्‌ 1940 में अमेरिका के बेथलहम शहर में एक गरीब अश्वेत परिवार में बीसवीं संतान के रूप में जन्मी थी विल्मा रूडोल्फ। पैदा होने के साथ ही त्रासदियाँ जैसे उससे जुड़ गईं। वह पोलियो, खसरा, छोटी माता, डबल निमोनिया और काला ज्वर जैसी भयानक बीमारियों की गिरफ्त में एक के बाद एक करके आती रही।

एक दिन डॉक्टरों ने उसकी माँ को बताया कि विल्मा अब कभी चल नहीं पाएगी। यह सुनकर वह एक क्षण के लिए तो उदास हो गईं, लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने फैसला किया कि मैं अपनी बच्ची को जिंदगीभर रेंगने नहीं दूँगी। यह जरूर चलेगी। न केवल चलेगी, बल्कि दौड़ेगी।

इस फैसले में परिवार के सभी लोगों ने उनका साथ दिया और शुरू हुई उस त्रासदी से लड़ने की कहानी। जब शहर में डॉक्टरों ने एक अश्वेत लड़की का इलाज करने से मना कर दिया, तो विल्मा की माँ उसे 50 मील दूर स्थित अस्पताल में सप्ताह में दो बार लेकर जाने लगी।

दो वर्ष में विल्मा स्टील के बने लेग ब्रेस की सहायता से चलने के काबिल बन गई। इसके बाद विल्मा ने दोगुने उत्साह से प्रयास शुरू कर दिए। वह मानसिक रूप से इतनी दृढ़ थी कि शारीरिक तकलीफों के बावजूद उसने साहस नहीं खोया।

इसी के चलते 11 वर्ष की उम्र में उसने अपने लेग ब्रेस को उतार फेंका और अपने पैरों पर चलने लगी। 14 वर्ष की उम्र में वह एक स्पोर्ट्स क्लब की सदस्य बनी और अपने जुझारूपन से जल्द ही उस क्लब की सितारा खिलाड़ी बन गई। लेकिन विल्मा का सपना तो एथलीट बनने का था। उसने दौड़ना शुरू कर दिया। एक दिन टेनेसी स्टेट यूनिवर्सिटी ने उसे ट्रेनिंग कैम्प में शामिल होने के लिए बुलाया। यहाँ उसे ट्रेनिंग कैम्प के कोच एड टैम्पल के रूप में एक गुरु मिल गए। इसके बाद विल्मा ने भी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

यह उसके कठोर परिश्रम का ही परिणाम था कि उसने 1960 के रोम ओलिम्पिक में 100 व 200 मीटर की दौड़ और 400 मीटर की रिले दौड़ में स्वर्ण पदक जीते। और एक ही ओलिम्पिक में तीन स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली अमेरिकी एथलीट बनी। रोम से लौटने पर पूरा अमेरिका उस लड़की के स्वागत में खड़ा था, जो कभी अपने पैरों पर भी खड़ी नहीं हो सकती थी। उन्हीं के बीच में थी उसकी माँ, जिसकी वजह से आज वह इस मुकाम पर पहुँची थी।
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