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मनीष शर्मा
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एक रियासत के राजा के पास अथाह संपत्ति होते हुए भी वह हमेशा इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि किस तरीके से और धन एकत्रित किया जाए। राजा के निमंत्रण पर एक बार जब गुरु नानकदेवजी उससे मिलने पहुँचे तो उन्होंने राजमहल में प्रवेश करने से पहले रास्ते में पड़े कुछ कंकर बीनकर अपनी दोनों मुट्ठियों में भर लिए।

राजा ने बड़े सम्मान से उन्हें आसन पर बिठाया। इस बीच उनकी मुट्ठी में से कुछ कंकर छिटककर कालीन पर गिर पड़े। राजा ने उन्हें देखकर नानक से पूछा- गुरुदेव! आपने ये कंकर अपनी मुट्ठी में क्यों भर रखे हैं। तब नानक मुस्कराकर बोले- राजन, मैं इन्हें मरने के बाद अपने साथ ले जाऊँगा ताकि ईश्वर को उपहार में दे सकूँ। इस पर राजा ठहाका लगाते हुए बोला- क्यों मजाक कर रहे हैं गुरुदेव।

परलोक में जाने वाली आत्मा तो अपने साथ एक कण भी नहीं ले जा सकती। इन कंकरों की तो बात ही क्या है। इस बार नानक हँसते हुए बोले- यही तरकीब तो मैं आपसे सीखने यहाँ आया हूँ राजन। आप कोई कमी न होने के बाद भी अपनी प्रजा को तरह-तरह से लूटकर धन इकट्ठा करते रहते हैं।

निश्चित ही आप उसे अपने साथ ले जाएँगे। यदि आप उसे साथ ले जाने का वह तरीका भी मुझे भी सिखा देंगे तो मैं भी यह उपहार ले जा सकूँगा। राजा नानक के कहने का आशय समझ गया और इसके बाद उसने अपनी आदत बदल ली।

दोस्तो, जितना आपके लिए जरूरी है, उतना यदि आपको मिल रहा है तो बेकार में परेशान न हों, क्योंकि ज्यादा की तो फिर कोई सीमा नहीं होती। आज आप अपनी रोटी से संतुष्ट नहीं हैं, तो कल पराठे से, परसों पूरी से, उसके अगले दिन पकवानों से, और अंततः छप्पन भोग से भी आप संतुष्ट नहीं होंगे।
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