एक बार एक व्यापारी संत कबीर से गुरुमंत्र लेने के लिए आया। वह बोला- महाराज, आप मुझे जल्दी से गुरुमंत्र दे दें, क्योंकि यह मेरी दुकानदारी का समय है। कबीर बोले- ठीक है, मैं तुम्हें गुरुमंत्र दे दूँगा, लेकिन इससे पहले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा।
ये पैसे लो और जाकर दूध ले आओ। वह व्यापारी तेजी से गया और दूध लेकर आ गया। कबीर ने एक बहुत ही गंदा-सा बर्तन उसके सामने किया और बोले- यह दूध इसमें उलट दो। व्यापारी- लेकिन महाराज, यह बर्तन तो बहुत गंदा है। शायद बहुत दिनों से साफ नहीं हुआ है। मैं इसमें दूध कैसे डाल सकता हूँ। कबीर- क्यों? व्यापारी- क्योंकि दूध गंदा हो जाएगा।
कबीर- अब तुम ही सोचो कि जब तुम इस बिना मँजे बर्तन में दूध डालने को तैयार नहीं हो तो मैं राम नाम के अति पावन मंत्र को तुम्हारे वर्षों से दूषित मन में कैसे डाल सकता हूँ। इसलिए पहले अपने मन को साफ करके आओ, तभी मैं तुम्हें गुरुमंत्र दूँगा। वह व्यापारी बात समझकर चुपचाप वहाँ से चला गया। | | एक बार एक व्यापारी संत कबीर से गुरुमंत्र लेने के लिए आया। वह बोला- महाराज, आप मुझे जल्दी से गुरुमंत्र दे दें, क्योंकि यह मेरी दुकानदारी का समय है। कबीर बोले- ठीक है, मैं तुम्हें गुरुमंत्र दे दूँगा, लेकिन इससे पहले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा। |
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दोस्तो, सही तो है। जब आपका मन ही शुद्ध नहीं है, तो आप अच्छी बातें कैसे ग्रहण करेंगे। नई, अच्छी और उपयोगी बातें सीखने-समझने, उन्हें मन में समाने के लिए पहले आपको अपना मन साफ करना होगा।
अन्यथा यदि आप सोचते हैं कि केवल सत्संगों में जाकर बैठने से, अच्छी-अच्छी बातें सुनने-पढ़ने से ही ज्ञान प्राप्त हो जाएगा तो यह आपकी भूल है। नया सीखने जाने से पहले जो लोग अपना पिछला-पुराना छोड़कर जाते हैं, वे ही नया लेकर लौटते हैं। और, जो पिछला लेकर जाते हैं, वे खाली हाथ ही लौटते हैं।
अक्सर लोग खुद को बदलने की ईमानदार कोशिश करने के बाद भी बदल नहीं पाते, क्योंकि वे बदलने से पहले अपना बर्तन माँजना भूल जाते हैं यानी वे पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होते और जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक कोई भी व्यक्ति नई सोच बनाने में कामयाब नहीं हो सकता, क्योंकि उस नई सोच को उसका दिमाग स्वीकार ही नहीं कर पाएगा। यदि आप भी नई सोच विकसित करना चाहते हैं तो आपको भी अपने दिमाग में जमी पुरानी गर्द झाड़ना होगी।
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