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मनीष शर्मा
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आज नारद जयंती है। एक बार जब देवर्षि नारद की तपस्या को कामदेव भंग नहीं कर पाए तो उन्हें यह अहं हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है। वे विष्णु से जाकर बोले- प्रभु, शिव की तरह ही आपका यह भक्त भी कामदेव को जीतकर सभी प्रलोभनों से परे हो गया है।

विष्णु बोले- बहुत अच्छा, लेकिन फिर भी तुम सतर्क रहना। न जाने कब क्या हो जाए। उनकी बात सुनकर नारद सोचने लगे- लगता है ये मेरी सफलता से प्रसन्न नहीं हुए। कामदेव को जीतने वाला कभी कमजोर कैसे पड़ सकता है। ऐसा सोचते हुए नारद वहाँ से चल दिए और एक नगर में पहुँचे। उस नगर का राजा राजकुमारी के साथ उनके स्वागत के लिए आया।

राजकुमारी को देखकर नारद उस पर मोहित हो गए। उसके प्रणाम करने पर वे आशीर्वाद देते हुए बोले- सदा सुखी रहो। तुम तो साक्षात लक्ष्मी हो। तुम्हें हरि जैसा पति मिले।
  आज नारद जयंती है। एक बार जब देवर्षि नारद की तपस्या को कामदेव भंग नहीं कर पाए तो उन्हें यह अहं हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है। वे विष्णु से जाकर बोले- प्रभु, शिव की तरह ही आपका यह भक्त भी कामदेव को जीतकर सभी प्रलोभनों से परे हो गया है।      
इस पर राजा ने उन्हें बताया कि वह जल्द ही राजकुमारी का स्वयंवर आयोजित करने जा रहा है। यह जानकर नारद उसे अपनी पत्नी बनाने की सोचने लगे और उन्होंने विष्णु का स्मरण किया। उनके प्रकट होने पर नारद बोले- प्रभु, मेरा मुख हरि जैसा कर दो। विष्णु 'तथास्तु' कहकर चले गए।


जब वे स्वयंवर स्थल पर पहुँचे तो उन्हें देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग हँसने लगे। नारद इसका कारण नहीं समझ सके। तभी राजकुमारी वरमाला लेकर आई और उनके पास से गुजर गई। नारद ने सोचा कि शायद यह देख नहीं पाई, इसलिए उसके पीछे जाकर बोले- सुंदरी, तुम जिसे खोज रही हो, वह हरि इधर है। माला मेरे गले में डाल दो। इस पर सभी जोर से हँस पड़े। एक बोला- वानर-मुख होकर भी राजकुमारी से विवाह का स्वप्न देखता है। उसकी बात सुनकर नारद को आश्चर्य हुआ।

तभी वहाँ विष्णु के प्रकट होने पर राजकुमारी ने उनके गले में वरमाला डाल दी। इस पर नारद चिढ़ते हुए बोले- प्रभु, आपने मुझे अपने जैसा मुख देने की बजाय वानर का मुख क्यों दिया? क्या इसलिए कि आप इस सुंदरी से विवाह कर सकें। इस पर विष्णु बोले- आपने मुझसे हरि जैसे मुख माँगा था, मैंने वही दिया। हरि का अर्थ वानर भी तो होता है। लेकिन फिर भी शांत होकर दृष्टि घुमाओ। नारद ने मुड़कर देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं था। वे समझ गए कि विष्णु ने उनका अहं दूर करने के लिए यह माया रची थी।

दोस्तो, नारद की तरह बहुत से लोग कोई बड़ी सफलता पाकर यह सोचने लगते हैं कि अब कोई काम उनके लिए कठिन नहीं। यह सोच व्यक्ति को लापरवाह बना देती है, जिसका अंत असफलता के रूप में ही होता है। इसलिए यदि आप भी अपनी किसी सफलता के कारण ऐसा कोई गुमान पालकर बैठे हैं, तो उसे जितनी जल्दी हो सके, दूर कर लें वरना उसकी वजह से आपकी खिल्ली उड़ने में देर नहीं लगेगी।
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