सूरदास के सैकड़ों शिष्य थे, जो उन्हें गायक महात्मा कहते थे। अनेक कठिनाइयाँ उठाकर सूरदास ने यह मुकाम हासिल किया था। अंधे होने की वजह से बचपन से ही उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता था। जब उन्होंने पढ़ने की इच्छा व्यक्त की तो उनके पिता ने यह कहकर भगा दिया कि अंधे को क्या पढ़ाऊँगा। इससे वे बेहद निराश हो गए।
एक बार गाँव से एक साधु मंडली भजन गाती-बजाती निकली। संगीत में उन्हें इतना आनंद आया कि वे बेसुध होकर उसके पीछे-पीछे चल दिए। इसके बाद वे घर नहीं लौटे। एक दिन जब सूरदास अपनी कुटिया में बैठे थे, तभी एक शिष्य ने आकर सूचना दी कि महाप्रभु वल्लभाचार्य वृंदावन जाने वाले हैं। उस समय के सभी विद्वानों में महाप्रभु शीर्ष पर थे।
इस पर उदास होकर सूरदास बोले कि काश, मेरी महाप्रभु से भेंट हो पाती। इस बीच एक और शिष्य आकर उनसे बोला- महाप्रभु आपसे भेंट करने कुटिया की ओर ही आ रहे हैं। सूरदास बोले- पागल हो गया है क्या? | | सूरदास के सैकड़ों शिष्य थे, जो उन्हें गायक महात्मा कहते थे। अनेक कठिनाइयाँ उठाकर सूरदास ने यह मुकाम हासिल किया था। अंधे होने की वजह से बचपन से ही उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता था। जब उन्होंने पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। |
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इतना बड़ा विद्वान मुझ जैसे तुच्छ प्राणी से मिलने क्यों आएगा? वे कहीं और जा रहे होंगे। तभी महाप्रभु वहाँ पहुँच गए। सूरदास को विश्वास ही नहीं हो रहा था। वे भाव-विभोर होकर गिरते-गिराते उनकी अगवानी के लिए बाहर आए और उनके पैरों में गिर पड़े।
आचार्य ने उन्हें उठाकर प्यार से गले लगा लिया और बोले- तुम्हारे गायन की बड़ी प्रशंसा सुनी है। तुम्हारा गायन सुनने की इच्छा हुई तो चला आया। सूरदास बोले- क्यों अंधे का दिल रख रहे हो महाप्रभु। थोड़ा-बहुत ऐसे ही गा लेता हूँ।
अपाहिज हूँ ना, इससे ज्यादा और कुछ सीखा ही नहीं। महाप्रभु बोले- तुम अपने आपको असहाय मानना बंद करो। तुम्हें यह घिघियाने की आदत छोड़ना होगी। तुम किसी से कम नहीं हो। अपनी कमियों से ध्यान हटाकर अपने गुणों को पहचानो।
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