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तैयार हैं न अपने नए अवतार के लिए
मनीष शर्मा
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एक बार हैहयराज सहस्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ महर्षि जमदग्नि के आश्रम से गुजर रहा था। महर्षि ने उसे आतिथ्य के लिए आमंत्रित किया। महर्षि ने अपनी कामधेनु गाय के जरिये पलक झपकते ही सभी अतिथियों के लिए छप्पनभोग की व्यवस्था कर दी।

कामधेनु का चमत्कार देख सहस्रबाहु सोचने लगा कि ऐसी अद्भुत गाय तो मेरी गौशाला में होना चाहिए। उसने महर्षि से कामधेनु को अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की, जिसे उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। इस पर सहस्रबाहु कामधेनु को उसके बछड़े सहित बलपूर्वक हड़पकर ले गया। जिस समय यह सब घटना घटी, उस समय महर्षि के पुत्र परशुराम आश्रम से बाहर गए हुए थे।

वापस आने पर जब उन्हें इस घटना के बारे में पता चला तो क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गईं। वे बोले- उस दुष्ट राजा की हिम्मत कैसे हुई यहाँ से कामधेनु ले जाने की? वो क्या समझता है, हम आश्रमवासी उसके अत्याचार को चुपचाप सह लेंगे। मैं इसका विरोध करूँगा और प्रण करता हूँ कि अपनी कामधेनु को वापस लेकर ही लौटूँगा। गुस्से में तमतमाते हुए वे सहस्रबाहु अर्जुन के महल पहुँचे और उसे कामधेनु वापस करने के लिए ललकारा।
  एक बार हैहयराज सहस्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ महर्षि जमदग्नि के आश्रम से गुजर रहा था। महर्षि ने उसे आतिथ्य के लिए आमंत्रित किया। महर्षि ने अपनी कामधेनु गाय के जरिये पलक झपकते ही सभी अतिथियों के लिए छप्पनभोग की व्यवस्था कर दी।      


सहस्रबाहु ने उनकी बात का उत्तर देने के बजाय अपने सैनिकों को परशुराम को मार डालने का आदेश दे दिया। तब परशुराम ने न केवल उन सैनिकों को, बल्कि बाद में पूरी सेना को नष्ट कर दिया। अंत में सहस्रबाहु स्वयं उनसे युद्ध करने आया, लेकिन परशुराम के युद्ध कौशल का वह ज्यादा देर तक सामना नहीं कर पाया और मारा गया। परशुराम कामधेनु व बछड़े को छुड़ाकर खुशी-खुशी आश्रम ले आए।

दोस्तो, सामने वाला कितना ही बड़ा, कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसके अत्याचार के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने हक की रक्षा के लिए उसका प्रतिकार करना चाहिए। परशुराम ने भी यही किया। आखिर जो वस्तु आपकी है, उसे कोई कितना ही ताकतवर क्यों न हो, कैसे छीन सकता है? उस पर कैसे अपना अधिकार जमा सकता है? क्या आप विरोध नहीं करेंगे? निश्चित करेंगे।

और यदि नहीं करते हैं तो इसका मतलब है कि आप कमजोर हैं, कायर हैं और साथ ही अपराधी भी, क्योंकि यदि हम अन्याय करने वाले को अपराधी मानते हैं तो सहने वाला भी बराबर का अपराधी होता है। इसलिए अन्याय का विरोध करें।
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