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जब खेलो तब खेलो जब पढ़ो तब पढ़ो
मेरिट में आने के चक्कर में बच्चे जी-तोड़ मेहनत करते हैं। यहाँ तक कि इसके चलते वे खेलना-कूदना भी भूल जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें भूलने पर मजबूर किया जाता है। उनके दिमाग में केवल एक ही बात भरी जाती है- पढ़ाई, पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई। लेकिन सिर्फ कोर्स की किताबें पढ़ने से ही बच्चा टॉप करने लग जाए तो फिर हर बच्चा टॉपर होता। बच्चे का मन खेल में है और डर के मारे मन मारकर वह किताब थामे बैठा है। अब जो वह पढ़ रहा है, उसे याद कैसे होगा?

यही होता भी है। और जब परीक्षा में उसे सवालों के जवाब नहीं आते हैं तो फेल होने के भय से वह नकल करने लगता है। एक बार नकल की लत लगी तो फिर आसानी से नहीं छूटती। कई बच्चे तो नकल करके टॉप भी कर जाते हैं। लेकिन, ऐसी सफलता का क्या फायदा? इसलिए अपने बाल-गोपाल पर इतना दबाव मत डालो कि वह तनाव में रहकर कुछ भी न सीख पाए।

और यदि सीखे भी तो नकल करने जैसी गलत आदतें। आपको तो उसे तनावरहित माहौल देना चाहिए, जिससे कि वह जो भी पढ़े, उसे याद रख पाए। इसलिए बच्चों का टाइम टेबल बनाएँ। हर काम का एक उचित समय होता है। इसलिए खेल के समय खेल और पढ़ाई के समय पढ़ाई होगी, तभी बच्चा सीखेगा।

दूसरी ओर, यह कहना भी सही नहीं होगा कि सभी माँ-बाप अपने बच्चों पर प्रेशर या दबाव बनाकर रखते हैं। कुछ बच्चे तो ऐसे होते हैं, जिन्हें हर वक्त खेल ही सूझता है। वे भी गलत हैं। खूब खेलें-कूदें, लेकिन साथ-साथ पढ़ाई भी करें। जो बच्चे इन दोनों में संतुलन बनाकर रखते हैं, वे ही एक दिन अपने सारे सपनों को साकार कर पाते हैं।

और अंत में, आगामी 9 मई को गोखलेजी की जयंती है। आइए, इस अवसर पर प्रण करें कि हम खेल और पढ़ाई दोनों में तालमेल बनाकर रखेंगे और अपनी मेहनत के बूते ही सफलता प्राप्त करेंगे।

यदि आप ऐसा करते हैं तो आपके माता-पिता कभी आप पर पढ़ने के लिए दबाव नहीं डालेंगे। क्योंकि इससे आप जीवन की हर परीक्षा में उन्हें अच्छे नंबरों से सफल होकर जो दिखाएँगे। ठीक है भई, स्पोर्ट्‌स में कॅरियर बनाना है, लेकिन वहाँ भी पढ़ाई तो जरूरी है।
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