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जब खेलो तब खेलो जब पढ़ो तब पढ़ो
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कुशाग्र बुद्धि के धनी गोपालकृष्ण गोखले कक्षा में हमेशा अव्वल रहते थे। एक बार उनके शिक्षक ने सभी छात्रों को घर से हल करके लाने के लिए कुछ सवाल दिए। गोपाल ने घर जाकर अपना होमवर्क निपटाया, लेकिन एक सवाल का हल वे नहीं कर पाए।

वे चाहते थे कि सभी सवाल हल किए जाएँ, जिससे कि उन्हें अधिक अंक मिल सकें। इसके लिए उनके मन में एक विचार आया और उन्होंने सवाल का हल कर लिया। अगले दिन स्कूल जाकर उन्होंने होमवर्क की कॉपी शिक्षक के पास जमा करा दी। सभी छात्रों की कॉपियाँ जाँची गईं।

जैसा कि होना था, गोपाल के सारे सवाल सही निकले और उन्हें पूरे नंबर मिल गए। शिक्षक ने इसके लिए उनकी बहुत प्रशंसा की और सभी विद्यार्थियों को उन्हीं की तरह सवाल हल करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने गोपाल को पास बुलाकर कहा- तुम्हारी इस सफलता पर खुश होकर मैं तुम्हें यह कलम इनाम में देना चाहता हूँ। लेकिन गोपाल ने उस कलम को लेने की बजाय रोना शुरू कर दिया। इससे सभी को हैरानी हुई।
  कुशाग्र बुद्धि के धनी गोपालकृष्ण गोखले कक्षा में हमेशा अव्वल रहते थे। एक बार उनके शिक्षक ने सभी छात्रों को घर से हल करके लाने के लिए कुछ सवाल दिए। गोपाल ने घर जाकर अपना होमवर्क निपटाया, लेकिन एक सवाल का हल वे नहीं कर पाए।      


शिक्षक के पूछने पर वे बोले- गुरुजी, मैंने एक सवाल का जवाब स्वयं हल न करके सहपाठी मित्र की सहायता से किया था। आपके द्वारा की जा रही अपनी झूठी प्रशंसा को मैं सह नहीं पाया और अपनी गलती पर मुझे रोना आ गया। आप यह कलम किसी और को दे दें, क्योंकि मैं इसका हकदार नहीं।

एक बालक के सच बोलने और अपनी गलती स्वीकार करने पर शिक्षक बहुत खुश हुए। वे गोपाल के हाथ में इनाम रखते हुए बोले- तुमने पूरी कक्षा के सामने अपनी गलती मानी है। यह बड़ी बात है। अब तो इस इनाम के सही हकदार तुम ही हो।

दोस्तो, आज के प्रतियोगी दौर में हम सभी को इस प्रसंग से सीख लेना चाहिए और दूसरों को भी सिखाना चाहिए। अभी परीक्षाओं का दौर है। बहुत से बच्चों की परीक्षाएँ हो चुकी हैं, जबकि कुछ की चल रही हैं या आगे होंगी। हर बच्चे के ऊपर उसके अभिभावकों का दबाव रहता है कि उसे कक्षा में मेरिट में आना होगा।
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