पांडवों के प्रति ईर्ष्या रखने वाला दुर्योधन उन्हें रास्ते से हटाने के नए-नए उपाय सोचता रहता था। एक दिन उसने धृतराष्ट्र से पांडवों को आदेश दिलवा दिया कि वे वारणावत में जाकर रहें। उनके वहाँ पहुँचने से पहले ही दुर्योधन ने अपने विश्वसनीय सेवक पुरोचन से वहाँ लाख का महल बनवाया, जिससे कि जब पांडव वहाँ जाकर रहें तो उन्हें जिंदा जलाकर मारा जा सके।
लेकिन उसकी यह योजना गुप्त न रह सकी। विदुर ने यह बात पता चलने पर सांकेतिक भाषा में युधिष्ठिर को वारणावत जाने से पहले ही समझा दी। वारणावत में पांडवों का बहुत स्वागतहुआ। वे लाक्षागृह में रहने लगे। महल को देखकर भीम को शंका हुई। तब युधिष्ठिर ने भीम को विदुर द्वारा कही गई बात बता दी। इस पर भीम को गुस्सा आ गया।
वह बोला- मैं अभी जाकर पुरोचन को ठिकाने लगाता हूँ। युधिष्ठिर बोले- नहीं भीम, शत्रु को कभी यह नहीं पतालगना चाहिए कि हमें उसकी योजना का पता चल चुका है, वरना वह सतर्क होकर नई चाल सोचने लगेगा। इसलिए हम उचित समय का इंतजार करेंगे। इस बीच विदुरजी द्वारा भेजा गया व्यक्ति सुरंग खोदने में जुट गया। | | एक दिन उसने धृतराष्ट्र से पांडवों को आदेश दिलवा दिया कि वे वारणावत में जाकर रहें। उनके वहाँ पहुँचने से पहले ही दुर्योधन ने अपने विश्वसनीय सेवक पुरोचन से वहाँ लाख का महल बनवाया, जिससे कि जब पांडव वहाँ जाकर रहें तो उन्हें जिंदा जलाकर मारा जा सके। |
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जब सुरंग तैयार हो गई तो युधिष्ठिर बोले- अब उचित समय है कि हमें प्रतीक्षा किए बिना स्वयं ही इस महल में आग लगाकर निकल जाना चाहिए। इस पर भीम ने पहले पुरोचन के कक्ष के दरवाजे पर और बाद में चारों ओर आग लगा दी। वहाँ जल्दी ही विकराल लपटें उठने लगीं और महल धू-धू कर जलने लगा। तब तक पाँचों भाई अपनी माता के साथ सुरंग के रास्ते सुरक्षित बाहर निकल चुके थे।
दोस्तो, ईर्ष्या की आग में जलते दुर्योधन को बाद में जब पता चला कि पांडव तो वहाँ से बच निकले, तो उसके दिल में नफरत की आग और जोरों से भड़क उठी। इस प्रकार उसके द्वारा बनवाया गया लाक्षागृह तो जलकर भस्म हो गया, लेकिन उसके हृदय में लगी ईर्ष्याग्नि ने उसके शरीर को ही लाक्षागृह बना दिया और अंततः इसी आग के कारण एक दिन वह खुद ही राख हो गया।
इसीलिए कहते हैं कि दूसरों को देखकर कभी मत जलो, क्योंकि जलोगे तो इससे किसी और का नहीं बल्कि आपका ही नुकसान होगा। ईर्ष्यालु प्रवृत्ति हमेशा ही दुखदायी होती है।
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