यदि कोई आपके मुँह पर आपकी आलोचना भी कर रहा है, तो बुरा मानने की बजाय यह आकलन करें कि उसमें कितनी सच्चाई है और अपने में सुधार लाएँ। याद रखिए, आपका भला चाहने वाला ही मुँह पर निंदा करता है। इसलिए वह क्रोध या दंड का नहीं, प्रशंसा का पात्र है।
इसके उलट जो लोग आपके मुँह पर आपके जैसी कहते हैं यानी ठकुर सुहाती करते हैं, वे अक्सर जबान चलाए की रोटी खाने वाले यानी चापलूस होते हैं, जिन्हें आपकी नहीं, अपने भले की चिंता होती है। जबान तो इनकी खींची जाना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के चक्कर में आप गलत निर्णय करके नुकसान उठाते हैं।
दूसरी ओर, बहुत से लोग बोलने की आजादी का नाजायज फायदा उठाते हैं। वे अपने मन में आने वाली हर ऊल-जुलूल बात को बिना सोचे-समझे बोले चले जाते हैं। ऐसे लोग अपनी जबान के कारण अक्सर मुसीबत में फँस जाते हैं। यदि आप भी ऐसी प्रवृत्ति के हैं तो समय रहते सुधर जाएँ।
बोलने की आजादी का मतलब यह नहीं कि जो मन में आए, बोलें। अँगरेजी कहावत है लिबर्टी इज़ नॉट लायसेंस यानी स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होता। यदि आप इसे लायसेंस समझते हैं तो निश्चित ही आपमें सेंस या समझ की कमी है। अगर आप अपनी जबान पर नियंत्रण रखे बगैर अनाप-शनाप, अर्थहीन बोलेंगे, तो आप इसकी सजा पाएँगे ही। इसलिए अपने मन और अपनी जबान पर नियंत्रण रखें। तब वह जो कहेगी, उससे आपका भला होगा।
और अंत में आज 'प्रेस स्वतंत्रता दिवस' है। कहते हैं सारी दुनिया कलम की जबान पर टिकी है, क्योंकि कलम में इतनी शक्ति होती है कि उसके बोलने पर आवाज भले ही सुनाई न दे, लेकिन वह बेआवाज होकर भी अच्छे-अच्छों की बोलती बंद कर देती है, पटिए उलाल कर देती है। शायद इसलिए अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की कोशिश की जाती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जिसने भी ऐसी कोशिश की है, उसने मुँह की खाई है। लेकिन ऐसा तभी होता है जब कलम निःस्वार्थ और अनुशासित हो वर्ना वह बेअसर हो जाती है।
यदि कलमकार चाहते हैं कि उनकी कलम की आवाज हमेशा बुलंद बनी रहे, तो उन्हें कलम को तुच्छ स्वार्थों से परे रखना होगा, तभी कोई उसकी आवाज को दबा नहीं पाएगा। मेरी प्यारी कलम, बस भी करो वर्ना लोग कहेंगे बहुत बोलती है।
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