एक नगर का बढ़ई अपने कार्य में बहुत ही कुशल था। उसके बनाए लकड़ी ।के सामान लोग दूर-दूर से खरीदने आते थे। उसका काम दिन दूना-रात चौगुना बढ़ता जा रहा था। काम को बढ़ते देख उसने अपने यहाँ एक की जगह दो लकड़हारे रख लिए थे। ये लकड़हारे जंगल से उच्च कोटि की लकड़ी काटकर बढ़ई के यहाँ भिजवा देते थे। दिन के अंत में बढ़ई उनका पारिश्रमिक दे देता था।
दोनों लकड़हारों को समान राशि मिलती थी। लेकिन कुछ दिनों से उनमें से एक लकड़हारे को अधिक राशि मिलने लगी। इस लकड़हारे को बढ़ई के यहाँ काम करते हुए अभी अधिक समय भी नहीं हुआ था।
एक दिन कम भुगतान पाने वाले लकड़हारे ने उससे पूछा- भैया, मैं यहाँ वर्षों से काम कर रहा हूँ। हम दोनों एक ही कद-काठी के हैं। फिर भी तुम रोज मुझसे ज्यादा लकड़ी काट लाते हो। यदि बता सको तो हमें भी बताओ कि कम समय में अधिक लकड़ी कैसे काटी जा सकती है? | | एक नगर का बढ़ई अपने कार्य में बहुत ही कुशल था। उसके बनाए लकड़ी ।के सामान लोग दूर-दूर से खरीदने आते थे। उसका काम दिन दूना-रात चौगुना बढ़ता जा रहा था। काम को बढ़ते देख उसने अपने यहाँ एक की जगह दो लकड़हारे रख लिए थे। |
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इस पर दूसरा बोला- हाँ-हाँ, क्यों नहीं। इसमें छुपाने जैसी कोई बात नहीं है। यदि मेरे बताने से मेरे साथी का भला होता है तो इसमें बुरा क्या है। बात सिर्फ यह है कि मैं लकड़ी काटते समय एक निश्चित अंतराल के बाद अपनी कुल्हाड़ी की धार को तेज कर लेता हूँ जबकि तुम कई-कई दिनों तक इस बात पर ध्यान नहीं देते। तुम भी ऐसा करना शुरू कर दो और फिर देखो कि तुम्हें भी अधिक पारिश्रमिक कैसे नहीं मिलता।
दोस्तो, इसे कहते हैं स्मार्ट वर्किंग। जब आप किसी भी काम को मेहनत के साथ ही समझदारी से भी करते हैं तभी उसे जल्दी पूरा कर पाते हैं। कहते हैं ना कि यदि घास भी काटना पड़े तो तरीके से काटो। यानी आप हार्ड वर्कर के साथ ही स्मार्ट वर्कर भी बनें।
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