एक दिन गद्दी पर बैठने के बाद गुरु अर्जनदेवजी के मन में विचार आया कि सभी गुरुओं की बानी का संकलन कर एक ग्रंथ बनाना चाहिए। जल्द ही उन्होंने इस पर अमल शुरू कर दिया। उस समय नानकबानी की मूल प्रति गुरु अर्जन के मामा मोहनजी के पास थी।
उन्होंने वह प्रति लाने भाई गुरदास को मोहनजी के पास भेजा। मोहनजी ने प्रति देने से इंकार कर दिया। इसके बाद भाई बुड्ढा गए, वे भी खाली हाथ लौट आए। तब गुरु अर्जन स्वयं उनके घर पहुँच गए। सेवक ने उन्हें घर में प्रवेश से रोक दिया। गुरुजी भी धुन के पक्के थे। वे द्वार पर ही बैठकर अपने मामा से गा-गाकर विनती करने लगे।
इस पर मोहनजी ने उन्हें बहुत डाँटा-फटकारा और ध्यान करने चले गए। लेकिन गुरु पहले की तरह गाते रहे। अंततः उनके धैर्य, विनम्रता और जिद को देखकर मोहनजी का दिल पसीजा और वे बाहर आकर बोले- बेटा, नानकबानी की मूलप्रति मैं तुम्हें दूँगा, क्योंकि तुम्हीं उसे लेने के सही पात्र हो। इसके बाद गुरु अर्जन ने सभी गुरुओं की बानी और अन्य धर्मों के संतों के भजनों को संकलित कर एक ग्रंथ बनाया, जिसका नाम रखा 'ग्रंथसाहिब' और उसे हरमंदिर में स्थापित करवाया। | | एक दिन गद्दी पर बैठने के बाद गुरु अर्जनदेवजी के मन में विचार आया कि सभी गुरुओं की बानी का संकलन कर एक ग्रंथ बनाना चाहिए। जल्द ही उन्होंने इस पर अमल शुरू कर दिया। उस समय नानकबानी की मूल प्रति गुरु अर्जन के मामा मोहनजी के पास थी। |
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बाद में ईर्ष्यालुओं की शिकायत पर जब जहाँगीर ने कुछ पदों को आपत्तिजनक कहकर उन्हें 'ग्रंथसाहिब' में से हटाने को कहा तो उन्होंने इंकार कर दिया और तमाम यातनाएँ सहकर भी घुटने नहीं टेके। यहाँ तक कि इसके लिए उन्हें अपने प्राण भी अर्पित करने पड़े।
दोस्तो, धुन के पक्के ही अपने मन की कर पाते हैं और दूसरों से भी अपने मन की करवा लेते हैं। जो जुनूनी होते हैं, वे निश्चित ही योग्य भी होते हैं, क्योंकि इसके लिए धैर्य, साहस, लगन, आत्मविश्वास जैसे गुणों का होना जरूरी है। जिनके अंदर ये गुण होते हैं, वे तो कुछ भी हासिल कर सकते हैं। इसलिए धुन के पक्के बनो। तभी अच्छे-अच्छे आपके जज्बे के आगे नतमस्तक होंगे, होते हैं।
जैसे कि मोहनजी को अर्जनदेवजी के सामने होना पड़ा। उन्होंने यह भी देख लिया था कि जो व्यक्ति नानकवाणी को पाने के लिए इतना जुनूनी है, उससे बढ़कर और कौन उस प्रति को पाने का हकदार हो सकता है, क्योंकि पाने के बाद वह अपना सब कुछ खोकर भी उसकी सुरक्षा करेगा।
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