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तीसरे के चक्कर में पड़ोगे तो तीन में रहोगे न तेरह में
मनीष शर्मा
एक बार एक लालाजी को व्यापार के सिलसिले में दूसरे नगर जाना था। रास्ते में एक जंगल पड़ता था और उन्हें यह डर था कि कहीं कोई डकैत लूट न ले। लेकिन जाना जरूरी था, इसलिए दिल पक्का करके वे अपने घोड़े पर रकम-सामान बाँधकर रवाना हो गए।

रास्ते में जरा-सी आवाज से भी वे सहम जाते। घोड़े के पाँव तले सूखा पत्ता आने की आवाज से उनके रोंगटे खड़े हो जाते और वे उस पर चिल्लाते कि देखकर नहीं चल सकता। इस बीच उन्हें पीछे से दो घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई दी। उन्हें लगा कि डाकू आ गए। पसीने से लथपथ उनकी पीछे देखने की हिम्मत नहीं हुई।

घुड़सवार नजदीक आए तो लालाजी बिना देखे बोले-हुजूर, आप लोग किधर पधार रहे हैं। एक घुड़सवार बोला- हम राजा के सिपाही हैं। नगर को जा रहे हैं। उनकी बात सुनकर लालाजी की जान में जान आई। वे बोले- तो क्या मैं भी आपके साथ हो लूँ। इस रास्ते में चोर-डाकुओं के भय से मेरी हालत खराब है। सिपाहियों ने इजाजत दे दी और तीनों आगे बढ़ गए। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्हें तीन घुड़सवार आते दिखे।
  एक बार एक लालाजी को व्यापार के सिलसिले में दूसरे नगर जाना था। रास्ते में एक जंगल पड़ता था और उन्हें यह डर था कि कहीं कोई डकैत लूट न ले। लेकिन जाना जरूरी था, इसलिए दिल पक्का करके वे अपने घोड़े पर रकम-सामान बाँधकर रवाना हो गए।      
लालाजी बोले-अब की बार खैर नहीं। यकीनन ये डाकू ही हैं।


इस पर एक सिपाही बोला- परेशान न हो लाला, एक को तो मैं ढेर कर दूँगा। दूसरा सिपाही- और एक मेरे से नहीं बच पाएगा। दोनों की बातें सुनकर लालाजी बोले- ये तो तुमने भली कही भाया। दो को तो तुम लोग संभाल लोगे लेकिन तीसरे का क्या? वह तीसरा मुझे नहीं छोड़ेगा। भगवान के लिए मुझे बचाओ।

दोस्तो, एक हद तक तो सभी डरते हैं, लेकिन यह तो अति है। कहते हैं धन आदमी को ताकतवर बना देता है। यह बात बहुत हद तक सही भी है, क्योंकि धन की ताकत से वह दूसरों से कुछ भी करवा सकता है। लेकिन मन का क्या? उसे तो धन कमजोर कर देता है। उसे हर वक्त धन के लुट जाने, डूब जाने, नष्ट हो जाने, घाटा हो जाने की चिंता जो सताती रहती है।

इसी के चलते वह हमेशा तनाव में रहता है और सब कुछ होने के बाद भी जीवन के बहुत से आनंदमय पलों का आनंद नहीं उठा पाता। इस तरह केवल धन के खोने की चिंता में वह बहुत कुछ खो देता है, खोता चला जाता है।
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