इस गैप को पाटने के लिए जरूरी है कि समय के बदलाव को स्वीकार कर लिया जाए। तब असहमति असहनीय नहीं होती। इसके उलट होने पर व्यक्ति का नई पीढ़ी से टकराव तो होता ही है, उसकी जिंदगी में भी एक तरह का ठहराव आ जाता है और वह जिंदगी की दौड़ में पिछड़ता जाता है। इसलिए जरूरी है बदलाव। यही ठहराव की बेड़ियों को तोड़कर टकराव को दूर कर दूरियाँ मिटाता है।
इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आपके परिवार, खानदान का नाम हमेशा रोशन रहे, तो बदलाव में न कोई रुकावट आने दें, न खुद रुकावट बनें। तभी प्रगति में निरंतरता बनी रहती है। वर्ना जब एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को परंपरा, अतीत, रूढ़ियों की बेड़ियों में जकड़ती है तो वह अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारती है। इसलिए आगामी पीढ़ी को संस्कार दें, लेकिन परंपरा के नाम पर बेड़ियाँ नहीं। सस्कार होंगे तो वह कभी ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे आपका सिर नीचा हो।
दूसरी ओर, कई बार बाहर के लोग परंपरा के नाम पर पिता-पुत्र के बीच टकराव पैदा करा देते हैं। वे मन में भर देते हैं कि आपके यहाँ जो हो रहा है, वह परंपरा विरोधी है। तब आप 'लोग क्या कहेंगे' के चक्कर में खुद के साथ ही अपने परिवार को भी तनाव में ला देते हैं और आपके परिवार की सरपट दौड़ती गाड़ी में ठहराव आ जाता है। यही तो दूसरे चाहते थे।
इसलिए बेहतर यही है कि दूसरों की बातों को नजरअंदाज कर अपने मन की सुनें। यदि पीढ़ियों की सोच में अंतर नहीं होगा तो नए विचार नहीं आएँगे। तब आपके परिवार की प्रगति रुक जाएगी। आपकी अगली पीढ़ी आपसे कमतर रह जाएगी।
और अंत में, आज 'एकनाथ षष्ठी' है। यदि आपका अपनी अगली पीढ़ी से मुद्दों पर सहमति नहीं है, मतभेद है, तो परेशान न हों। बस मनभेद नहीं होना चाहिए। साथ-साथ चलते-चलते आप एक दिन एकमत हो ही जाएँगे। ऐसा होता ही है, होता आया है। चलो पापा, कुछ और बात करें।
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