इसकी अति होने पर अकसर यह खेल उल्टा पड़ जाता है और जब सामने वाला भी अभिनय पर उतर आता है तो आप चारों खाने चित नजर आते हैं, क्योंकि तब सभी उसका साथ देते हैं, आपका नहीं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि गलत आप हैं, वह नहीं। कहते भी हैं कि बात-बात पर जो खड़ा करते हैं तमाशा, उनके हाथ लगती है निराशा। इसलिए किसी बात के तमाशे बनाकर इतना न बढ़ाएँ कि तमाचे लगें।
इसके साथ ही यदि आप अपने घर को ही रंगमंच बना लेंगे तो इसका नुकसान भी तो आपको ही भुगतना पड़ेगा। आखिर तमाशा देखने वाले तो उसका मजा भी लेंगे और आपकी गली के नुक्कड़ पर उसके बारे में चटकारे ले-लेकर बातें करेंगे, खिल्ली उड़ाएँगे। इसलिए अपने घर को नुक्कड़ नाटक का जरिया न बनाएँ और घर की बात घर की चहारदीवारी में ही रहने दें। दीवार से बाहर आते ही पास-पड़ोस के लोग आपके नाटक के दर्शकभर बनेंगे और नाटक देखकर ताली भी नहीं बजाएँगे। यानी आपको अपने अभिनय के बदले सिवाय बदनामी के कुछ हासिल नहीं होगा।
और अंत में, आज 'वर्ल्ड थिएटर डे' है। हर व्यक्ति के अंदर अभिनय के पैदाइशी गुण होते हैं क्योंकि उसमें नवरस के जन्मजात भाव जो होते हैं। वैसे भी कहते हैं कि दुनिया एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ, जिनकी डोर किसी और के हाथ है। हम सब इस दुनिया में अपनी-अपनी भूमिका निभाने आए हैं, निभा रहे हैं।
हाँ, उसने इतनी छूट जरूर दी है कि यदि हम अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभाते हैं तो वह तालियों की बजाय इनाम से, तरक्की से, खुशियों से नवाजता रहता है ताकि हम आगे की भूमिका और उत्साह से निभा सकें।
इसलिए यदि आप अपने व्यक्तिगत, व्यावसायिक, सामाजिक, पारिवारिक यानी हर रोल को बिना गोलमाल किए निभाएँगे, तभी जिंदगी के गोल या लक्ष्य हासिल कर पाएँगे, गोल लगा पाएँगे। अरे भई, बंद करो तुम्हारी यह रोज-रोज की एक-सी नौटंकी। कुछ नया करो।
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