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खड़ा जो करोगे तमाशा तो हाथ लगेगी निराशा
मनीष शर्मा
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एक गाँव के महाजन के घर में आई नई बहू ने कुछ ही दिनों में सास के साथ झगड़ना शुरू कर दिया। शुरुआत में तो सास चुप रह जाती, लेकिन समय के साथ उसने भी लोहा लेना शुरू कर दिया। एक दिन दोनों में जमकर छिड़ गई। बहू बोली- आपने चूँ-चपड़ बंद नहीं की तो मैं घर छोड़कर चली जाऊँगी।

जब सास पर उसकी घुड़की का कोई असर नहीं हुआ तो वह घर से बाहर निकलकर इस उम्मीद में खड़ी हो गई कि घर का कोई व्यक्ति उसे रोकेगा। लेकिन घरवालों के लिए तो यह रोजमर्रा की नौटंकी थी, इसलिए कोई कुछ नहीं बोला। अब बहू चक्कर में पड़ गई कि क्या करे। वापस लौटती है तो सास के सामने कच्ची हो जाएगी। तभी उसे जंगल से चरकर घर लौट रहे मवेशी दिखाई दिए।

उसके मन में एक विचार आया और उसने अपनी भैंस के पाड़े की पूँछ पकड़ ली। वह तुरंत घर के अंदर भागा। इस पर बहू भी उसके साथ-साथ अंदर आती हुई बोली- 'भैंसजी का पाड़ाजी, मती ले जाओ माड़याजी।' यानी भैंस के पाड़े, तुम मुझे जबर्दस्ती घर में मत ले जाओ।
  आज 'वर्ल्ड थिएटर डे' है। हर व्यक्ति के अंदर अभिनय के पैदाइशी गुण होते हैं क्योंकि उसमें नवरस के जन्मजात भाव जो होते हैं। वैसे भी कहते हैं कि दुनिया एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ, जिनकी डोर किसी और के हाथ है।      


दोस्तो, ऐसे ही लोगों को कहते हैं नौटंकीबाज, जो बात-बात पर नाटक-नौटंकी करने लगते हैं और नाटक भी ऐसा कि बड़े-बड़े अभिनेता-अभिनेत्री भी इनके आगे पानी भरते नजर आएँ। इसी नाटक के सहारे ये अपने मन की कर लेते हैं, करवा लेते हैं। सामने वाला भी इनकी कलाकारी को जानने के बावजूद यह सोचकर इनकी बात मान लेता है कि कौन तमाशा खड़ा करे। बेकार ही घर-परिवार की खिल्ली उड़ेगी।

यदि आप भी ऐसे ही हैं तो आपको यह रोज-रोज का नाटक एक दिन भारी पड़ सकता है जैसा कि उस बहू को पड़ा था। वह तो पाड़ा सामने आ गया वर्ना उसे लेने के देने पड़ जाते। इसलिए अपनी बात मनवाने के लिए अपनी अभिनय कला का प्रयोग कभी कभार करना तो ठीक है, लेकिन जब आप इसे अपनी आदत बना लेते हैं तो वह तंग आकर ठान लेता है कि आज तो नहीं झुकूँगा। जो होगा, सो देखा जाएगा। अगर इससे बीच-बाजार हँसी उड़ती है तो उड़ने दो।

तब आप न इधर के रहते हैं, न उधर के और आपका नाटक आप पर ही भारी पड़ जाता है। इसलिए सामने वाले की भलमनसाहत का नाजायज फायदा नहीं उठाना चाहिए।
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