उन्मादी भीड़ तूफान की तरह सब कुछ तहस-नहस कर देती है। और जब भीड़ पर सांप्रदायिकता का चश्मा चढ़ा हो तो फिर वह नियंत्रण से बाहर हो जाती है। देश और दुनिया ने भीड़ की वजह से अनेक ऐसे नुकसान झेले हैं, जिनकी भरपाई फिर कभी संभव नहीं हो पाई। इसके लिए दोषी भीड़ में शामिल हर व्यक्ति होता है। इसलिए कभी भी भीड़ का हिस्सा न बनें। वैसे भी भीड़ की कोई पहचान नहीं होती।
भीड़ सिर्फ भीड़ होती है। इसमें शामिल लोगों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व, कोई स्वतंत्र पहचान नहीं होती। इसके विपरीत जो भीड़ से भिड़ते हैं, वे अपनी अलग पहचान बनाते हैं। उन्हें हमेशा याद रखा जाता है, क्योंकि वे धारा के विपरीत जो बहते हैं। यदि आप भी भेड़चाल से कुछ हटकर करेंगे, तो आपकी भी अलग पहचान बनेगी।
और अंत में, आज गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान दिवस है। वे भीड़ से अलग थे, उससे घबराते नहीं थे। इसीलिए पत्रकारिता जगत में भी उनका अलग नाम है, अलग सम्मान है। यह बात अलग है कि आज के कुछ पत्रकार किसी दंगे में मरने वाले को बचाने की बजाय अपनी खबर बनाने की चिंता में लगे रहते हैं, क्योंकि उनकी नजर में सामने वाले के बचने से उनकी खबर मर जाएगी। इसलिए वो जाए भाड़ में, हम तो अपना काम करें। यह सोच ही गलत है।
बचाने से ही तो खबर जिंदा होती है, बनी रहती है। और जब कोई खबर इंसानियत को मारकर बनाई जाए तो वह खबर हो ही नहीं सकती। उस खबर को छापने वाला अखबार नहीं हो सकता। इसलिए शायद आजकल अखबार की परिभाषा पर खरे उतरने वाले अखबारों की संख्या गिनी-चुनी रह गई है।
बाकी सब तो उत्पाद हैं, प्रॉडक्ट हैं, माल हैं, साधन हैं धन कमाने के। यही भेड़चाल है और इसीलिए वे भीड़ का हिस्सा हैं। आज का दिन हमें खबरदार करता है कि जब भी काम और इंसानियत में से किसी एक को चुनना पड़े तो इंसानियत को चुनें। अरे भई, भीड़ मत लगाओ।
|