अँगरेजों द्वारा भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने की देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इससे घबराकर अँगरेजों ने देश में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए। भाई भाई के खून से होली खेलने लगा। सैकड़ों निर्दोषों की जान चली गई।
ऐसे में कानपुर में लोकप्रिय अखबार 'प्रताप' के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी पूरे दिन दंगाग्रस्त क्षेत्रों में घूमकर निर्दोषों की जान बचाते रहे। कानपुर के जिस इलाके से भी उन्हें लोगों के फँसे होने की सूचना मिलती, वे तुरंत अपना काम छोड़कर वहाँ पहुँच जाते, क्योंकि उस समय पत्रकारिता की नहीं, मानवता की जरूरत थी। उन्होंने बंगाली मोहल्ले में फँसे दो सौ मुस्लिमों को निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया।
एक वृद्ध मुस्लिम ने उनका हाथ चूमकर उन्हें 'फरिश्ता' पुकारा। उनके कपड़े घायलों और लाशों को उठाने के कारण खून से सन गए तो वे घर नहाने पहुँचे। लेकिन तभी चावल मंडी में कुछ मुस्लिमों के फँसे होने की खबर आई। उनकी पत्नी उन्हें पुकारती रह गई और वे 'अभी आया' कहकर वहाँ पहुँच गए। वहाँ फँसे लोगों को सुरक्षित जगह पहुँचा ही पाए थे कि दोपहर के तीन बजे घनी मुस्लिम आबादी से घिरे चौबे गोला मोहल्ले में दो सौ हिन्दुओं के फँसे होने की खबर आई। वे तुरंत वहाँ जा पहुँचे। | | अँगरेजों द्वारा भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने की देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इससे घबराकर अँगरेजों ने देश में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए। भाई भाई के खून से होली खेलने लगा। सैकड़ों निर्दोषों की जान चली गई। |
| |
वे निर्दोषों को जैसे-तैसे निकालकर लॉरी में बिठा ही रहे थे कि तभी हिंसक भीड़ वहाँ आ पहुँची। कुछ लोगों ने उन्हें पहचान लिया। लेकिन वे कुछ कर पाते, इसके पहले ही भीड़ में से किसी ने एक भाला विद्यार्थीजी के शरीर में घोंप दिया। साथ ही उनके सिर पर लाठियों के कुछ प्रहार हुए और मानवता का पुजारी इंसानियत की रक्षा के लिए, शांति स्थापना के लिए शहीद हो गया।
दोस्तो, कहते हैं भीड़ और भेड़ में कोई अंतर नहीं होता। जिस तरफ एक चलता है, उस तरफ सारे चल देते हैं। कोई अपना दिमाग नहीं लगाता, क्योंकि भीड़ का रिमोट कंट्रोल जिसके पास में होता है, वह भीड़ का हिस्सा बने लोगों के दिमाग की सोचने-समझने की क्षमता को जाम कर देता है। तब अच्छा-बुरा सोचे-समझे बगैर निष्ठुर भीड़ क्रूरता से अपने काम को अंजाम देती है।
|