एक बार घर के आँगन में बालक भगतसिंह ने गड्ढा खोदकर उसमें अपना खेलने का तमंचा दबा दिया और फिर उस पर पानी डालने लगा। यह देखकर घर आए उनके पिता के एक दोस्त ने पूछा- पुत्तर, तुम ये क्या कर रहे हो? बालक बोला- चाचाजी, मैं तमंचा बो रहा हूँ।
इसके झाड़ में बहुत सारे तमंचे लगेंगे जिन्हें मैं अपने साथियों के साथ बाँटूँगा और हम अँगरेजों से युद्ध करेंगे। यह सुनकर उसके पिता हतप्रभ रह गए। इसी तरह बालक सुखदेव एक दिन बहुत खोजबीन कर बाजार से महारानी लक्ष्मीबाई का एक चित्र खरीद लाया और अपनी माँ को वह चित्र दिखाकर बोला- देखो तो माँ, कितनी वीरांगना थी महारानी लक्ष्मीबाई।
वे अपनी पीठ से अपने बेटे को बाँधकर अँगरेजों से युद्ध करती थीं। माँ बोलीं- भारत के लोगों को वीर होना ही चाहिए। हमारे पूर्वज भी बहुत बहादुर थे। सुखदेव- माँ, मैं भी वीर बनूँगा और बड़ा होकर अँगरेजों से युद्ध करके अपने देश को आजाद कराऊँगा। उधर क्रांतिकारियों में बच्चों की तरह देखे जाने वाले राजगुरु को बहादुरी की पहली परीक्षा के अंतर्गत दिल्ली के एक गद्दार साथी को गोली से उड़ाने का काम सौंपा गया। | | एक बार घर के आँगन में बालक भगतसिंह ने गड्ढा खोदकर उसमें अपना खेलने का तमंचा दबा दिया और फिर उस पर पानी डालने लगा। यह देखकर घर आए उनके पिता के एक दोस्त ने पूछा- पुत्तर, तुम ये क्या कर रहे हो? बालक बोला- चाचाजी, मैं तमंचा बो रहा हूँ। |
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एक शाम दिल्ली में अकेले घूमने जा रहे उस गद्दार पर मौका देखते ही राजगुरु ने गोलियाँ दाग दीं। गोलियों की आवाज से पुलिस की दौड़-धूप शुरू हो गई। राजगुरु सड़क की बजाय रेलवे लाइन के सहारे भागने लगे। रेलपथ से लगे सड़क मार्ग से पुलिस की गाड़ियों को पीछा करते देख वह खेतों की तरफ मुड़ गया और एक पानी भरे खेत में लोट लगाकर सारे शरीर पर कीचड़ लपेट लिया।
पुलिस वालों ने उधर आकर टॉर्च की रोशनी में ढूँढा लेकिन राजगुरु नजर नहीं आया। पुलिस को जाने के तीन घंटे बाद वह उठा और अपने साथियों के पास पहुँच गया। इस घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद ने उसे बहादुर और सूझबूझ वाला मानकर इंस्पेक्टर जेपी सॉन्डर्स की हत्या के अभियान में भगतसिंह के साथ शामिल कर लिया।
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