एक वृद्ध सियार ने जब उसकी असलियत पता लगाया तो सबको यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि अपनी ही जाति वाले ने उनका अपमान किया है। उसकी पोल खोलने की योजना के तहत तय समय पर सभी सियार मिलकर 'हुँवा-हुँवा' करने लगे। उनकी बोली को सुनकर वह रंगा सियार भी उमंग में अपनी जातीय प्रकृति के अनुसार वैसी ही आवाज निकालने लगा। फिरक्या था? इधर सभी सियारों के चेहरों के रंग खिले और उधर रंगे सियार के रंग में भंग पड़ गई।
रंगेहाथों पकड़े जाने पर उसका चेहरा काला पड़ गया। उसके छल-कपट का पता चलते ही सभी जानवरों ने उसे दबोचकर मार डाला।
दोस्तो, बड़ी ही रंगारंग है न आज की कहानी। वैसे आज का दिन ही रंग मचाने का है, रंग जमाने का है, तो फिर रंग में आने में देरी क्यों? खुद भी रंगो और दूसरों को भी रंगो। लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि कहीं भी किसी के साथ जोर-जबरदस्ती न हो। जो होली खेलना चाहे उसके साथ ही खेलो। जो न खेलना चाहे, उसे खेलने के लिए मनाओ, लेकिन दबाव न डालो, क्योंकि यह त्योहार ही है प्रेम, उल्लास, उत्साह और उमंग का।
हम एक-दूसरे पर जब रंग डालते हैं तो उसके पीछे यही भाव तो होता है कि चलो मिलकर खुशियाँ मनाएँ, खुशियाँ बाँटें। एक-दूसरे को इन्हीं भाव रंगों में रंगें। यही तो वह पक्का रंग है जो हमारे ऊपर चढ़कर कभी उतरता नहीं। बाकी सारे रंग तो समय के साथ फीके पड़ जाते हैं, उतर जाते हैं।
दूसरी ओर, कुछ लोग उस रंगे सियार की तरह होली के रंग में रंगकर अपनी आपसी दुश्मनी व बैर निकालते हैं। कुछ रंगने के अशिष्ट व असभ्य तरीकों पर उतर आते हैं। होली की आड़ में ऐसे लोग एक-दूसरे का अपमान करते हैं, कीचड़ उछालते हैं, हुल्लड़बाजी करते हैं।
इनसे बचना चाहिए क्योंकि यह वातावरण को दूषित करते हैं। होली खेलने-खिलाने का यह गलत तरीका है। यह तन के साथ ही मन की रंगत भी बिगाड़ देता है। जैसा कि पहले कह चुके हैं कि रंग डालना तो सिर्फ प्रतीक है। इसका असल मकसद तो यह है कि हम एक-दूसरे को सद्गुणों के रंगों में रंगें। आपसी वैमनस्य भूलकर हँसी-खुशी से रहें। ऐसा करने से ही हमारी दुनिया और हमारा भविष्य रंगीन होगा।
सभी को होली की रंगारंग शुभकामनाएँ।
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