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हो ली सो हो ली अब आगे की सोचो
मनीष शर्मा
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एक बार विष्णु-विरोधी असुरराज हिरण्यकशिपु त्रिलोक-विजय के लिए तपस्या में लीन था। मौका देखकर देवताओं ने उसके राज्य पर कब्जा कर लिया। उसकी गर्भवती पत्नी को ब्रह्मर्षि नारद अपने आम में ले आए। वे उसे प्रतिदिन धर्म और विष्णु महिमा के बारे में बताते।

यह ज्ञान गर्भ में पल रहे पुत्र प्रहलाद ने भी प्राप्त किया। बाद में असुरराज ने बह्मा के वरदान से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली तो रानी उसके पास आ गई। वहाँ प्रहलाद का जन्म हुआ। बाल्यावस्था में पहुँचकर प्रहलाद ने विष्णु-भक्ति शुरू कर दी। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपने गुरु को बुलाकर कहा कि ऐसा कुछ करो कि यह विष्णु का नाम रटना बंद कर दे। गुरु ने बहुत कोशिश की किन्तु वे असफल रहे। तब असुरराज ने अपने पुत्र की हत्या का आदेश दे दिया।

उसे विष दिया गया, उस पर तलवार से प्रहार किया गया, विषधरों के सामने छोड़ा गया, हाथियों के पैरों तले कुचलवाना चाहा, पर्वत से नीचे फिंकवाया, लेकिन ईश कृपा से प्रहलाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ। तब हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाकर कहा कि तुम प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ जाओ, जिससे वह जलकर भस्म हो जाए।
  एक बार विष्णु-विरोधी असुरराज हिरण्यकशिपु त्रिलोक-विजय के लिए तपस्या में लीन था। मौका देखकर देवताओं ने उसके राज्य पर कब्जा कर लिया। उसकी गर्भवती पत्नी को ब्रह्मर्षि नारद अपने आम में ले आए। वे उसे प्रतिदिन धर्म और विष्णु महिमा के बारे में बताते।      


होलिका को वरदान था कि उसे अग्नि तब तक कभी हानि नहीं पहुँचाएगी, जब तक कि वह किसी सद्वृत्ति वाले मानव का अहित करने की न सोचे। अपने भाई की बात को मानकर होलिका भतीजे प्रहलाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ गई। उसका अहित करने के प्रयास में होलिका तो स्वयं जलकर भस्म हो गई और प्रहलाद हँसते हुए अग्नि से बाहर आ गया।

दोस्तो, कह सकते हैं कि यदि आपके पास सद्गुणों का भंडार है, आपके उच्च संस्कार हैं, तो कोई भी आपका अहित नहीं कर सकता। यदि कोई आपका अहित करने की सोचता भी है तो वह स्वयं ही होलिका की तरह नष्ट हो जाता है। वैसे भी जब आप ईर्ष्या की आग में जलते हों तो सामने वाले की जगह स्वयं को ही जलाते हो। यानी इससे आपका ही अहित होता है।

दूसरी ओर, जीवन में कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं कि जब आप असंस्कारित और दुर्गुणी व्यक्तियों को अपने से आगे निकलता हुआ देखते हैं। तब आपको लगने लगता है कि संस्कारवान और गुणवान होने का कोई लाभ नहीं है। लेकिन यह सब क्षणिक है।
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