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मिलता है कंधे से कंधा तभी चलता है धंधा
मनीष शर्मा
पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आरती में इतनी भीड़ थी कि कंधे से कंधा छिल रहा था। ऐसे में गरुड़ स्तंभ के पास खड़े होकर चैतन्य महाप्रभु पूरी तन्मयता से आरती देख रहे थे। इस बीच उनके पास खड़ी नाटे कद की एक महिला बड़ी देर से उचक-उचककर भगवान के दर्शन का प्रयास कर रही थी, लेकिन सफल नहीं हो पा रही थी।

तब वह स्तंभ पर एक पैर टिकाकर ऊँची उठ गई और, लेकिन इस कोशिश में उसका संतुलन बिगड़ गया। गिरने से बचने के लिए उसने महाप्रभु के कंधे का सहारा ले लिया और भगवान के दर्शन कर भाव विभोर हो उठी। तभी महाप्रभु के शिष्य गोविंद की दृष्टि उस महिला पर पड़ी तो उनकी त्यौरियाँ चढ़ गईं। उन्होंने गुस्से में आकर उस पर चिल्लाना शुरू कर दिया। उन्हें रोकते हुए महाप्रभु बोले- शांत हो जाओ गोविंद। ऐसा न करो।

मेरे लिए इससे बढ़कर सौभाग्य की बात क्या हो सकती है कि इन माँ स्वरूपा देवी ने भगवान जगन्नाथ के दर्शनों के लिए मेरे कंधों का सहारा लिया। आज इन कंधों ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी। मेरा यह तुच्छ-सा शरीर प्रभु के किसी भक्त के काम तो आया। महाप्रभु के विचार सुनकर गोविंद की न केवल नजरें झुक गईं।
  गरुड़ स्तंभ के पास खड़े होकर चैतन्य महाप्रभु पूरी तन्मयता से आरती देख रहे थे। इस बीच उनके पास खड़ी नाटे कद की एक महिला बड़ी देर से उचक-उचककर भगवान के दर्शन का प्रयास कर रही थी, लेकिन सफल नहीं हो पा रही थी।      


दोस्तो, वो कंधे ही क्या जो किसी के काम न आएँ। लेकिन बहुत से लोग यह बात नहीं समझते। चाहे कोई कितना ही कष्ट में क्यों न हो, ये उसे कंधे नहीं देते यानी उसकी सहायता नहीं करते। यदि आप भी इसी प्रवृत्ति के हैं तो इसका मतलब है कि आप बहुत स्वार्थी जीव हैं।

लेकिन आप यह जान लें कि यदि आप आज दूसरों की तकलीफ में अपने कंधे छिपाएँगे तो जब आप तकलीफों में होंगे तो कोई आपको कंधे नहीं लगाएगा। इसलिए दूसरों के काम आओ। इससे मानसिक रूप से भी आपको सुखद अनुभूति होती है। साथ ही आपके कंधे भी मजबूत होते हैं। इन्हें मजबूत करने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि दूसरे का बोझ उठाया जाए।
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