ऐसे में यदि आप जीने के लिए दूसरों की जान साँसत में डालकर रखेंगे तो एक दिन आपकी जान पर भी तो बनेगी। तब आपके लिए अपनी जान बचाना आसान न होगा।
दूसरी ओर, नौकरी-पेशे में कई बार व्यक्ति को लगता है कि उसके द्वारा किए गए गलत काम के कारण वह फँस सकता है या उसकी जान पर बन आती है तो वह पीछा छुड़ाने के लिए उस गलत काम का ठीकरा किसी दूसरे के सिर पर फोड़ देता है। ऐसा अकसर उच्च पद पर बैठे लोग करते हैं, जो अपने द्वारा की गई गलतियों या अनियमितताओं की जिम्मेदारी खुद लेने की बजाय या उनसे बचते हुए उसका दोष किसी जूनियर या अधीनस्थ के सिर पर मढ़ देते हैं।
गलत कार्यों या भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारी इसी उधेड़बुन में रहते हैं कि मुसीबत के समय वे जाल में किसे फँसाएँगे, उलझाएँगे। इस तरह वे खुद अपनी जान बचाकर मजे लेते रहते हैं और जाल में फँसा व्यक्ति अपनी जान छुड़ाने के लिए हाथ-पैर मारता रहता है। लेकिन कहते हैं न कि निर्दोष की बद्दुआ तेजी से लगती है।
ऐसे में जब कोई ऐसा व्यक्ति चपेट में आता है, जिसका उनकी जालसाजी से किसी भी तरह का नाता नहीं होता, तब उसकी सहायता ऊपर वाला करता है और दूसरों के लिए जाल पसारने वाला एक दिन खुद ही उस जाल में उलझ जाता है। ऐसा इसलिए होता है जब नीचे वाले देखते हैं कि गलत खुद करता है और फँसा हमें देता है, तो वे मिलकर ऐसा जाल बिछाते हैं कि वही उसमें उलझ जाता है।
बड़े-बड़े अधिकारियों की भद्द इसी तरह पिटती है। इसलिए ऐसा काम किया ही क्यों जाए कि जान पर बन आए और उसे बचाने के लिए दूसरों की जान से खेलना पड़े। आप अच्छे कर्म करके भी सुख-चैन से रह सकते हैं।
और अंत में, शुक्रवार को ईद मिलादुन्नबी है यानी पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब का जन्मदिन। वे जीवमात्र पर दया करते थे और 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत पर चलते थे और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते थे। हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। अरे भई, चिंता मत करो। बॉस हूँ तो गलती के लिए मैं जिम्मेदार हूँ, तुम नहीं।
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