मुख्य पृष्ठ > खबर-संसार > करियर > गुरु-मंत्र
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
अपने ही जाल में उलझ जाते हैं जाल बुनने वाले
मनीष शर्मा
ND
एक बार पैगंबर हजरत मुहम्मद और उनके एक साथी का कुछ सिपाही पीछा कर रहे थे। उन्हें पास आता देख दोनों एक खोह में छिपने के लिए पहुँचे। वहाँ मकड़ी का एक घना जाला था। साथी ने आगे बढ़कर उस जाले को साफ करना चाहा, तो वे बोले- दोस्त, खुदा के वास्ते इस जाले को न तोड़ो। इसमें लगी मकड़ी की मेहनत को यूँ जाया न करो। यह गलत होगा।

साथी बोला- लेकिन हमारे पास अपनी जान बचाने के लिए बहुत कम वक्त है। इसे तोड़कर ही अपनी जान बचाई जा सकती है। इस पर वे बोले- तुम्हारा कहना ठीक है, लेकिन यह भी तो ठीक नहीं कि अपनी जान बचाने के लिए किसी दूसरे को तकलीफ पहुँचाई जाए। यही तो वह इम्तिहान की घड़ी है, जब यह तय होगा कि हम दयालु हैं या नहीं। ऐसे वक्त दया न की जाए तो कब की जाए।

साथी को बात समझ में आ गई और दोनों बिना जाला साफ किए जमीन के सहारे लेटकर खोह में जा छिपे। जब सिपाही वहाँ पहुँचे तो वे जाला देखकर सोचने लगे कि यदि वे दोनों खोह में घुसे होते तो यह जाला जरूर टूट गया होता। निश्चिंत होकर सिपाही आगे बढ़ गए।
  एक बार पैगंबर हजरत मुहम्मद और उनके साथी का कुछ सिपाही पीछा कर रहे थे। उन्हें पास आता देख दोनों एक खोह में छिपने के लिए पहुँचे। वहाँ मकड़ी का एक घना जाला था। साथी ने आगे बढ़कर उस जाले को साफ करना चाहा, तो वे बोले-दोस्त, खुदा के वास्ते इस जाले को न तोड़ो      


दोस्तो, ऐसा होता है दया का परिणाम। दया को ईश्वरीय गुण माना गया है। और हजरत मुहम्मद साहब तो स्वयं पैगंबर थे, उनमें तो यह गुण होना ही था। वे हमेशा जियो और जीने दो के फलसफे पर जोर देते थे। लेकिन बहुत से लोग दूसरों को दुःखी-बेचैन कर स्वयं सुख-चैन से जीना चाहते हैं। उन्हें सुख ही तब मिलता है, जब किसी दूसरे की आह निकले। यदि आप भी ऐसी ही प्रवृत्ति के हैं, तो याद रखें कि आपको अपनी करनी की भरनी भोगना ही पड़ेगी।

इसलिए यदि हमेशा सुख-चैन से जीना चाहते हैं तो दूसरों को भी सुख-चैन से जीने दें। अपनी जान सलामत रखने के लिए दूसरे की जान के पीछे न पड़ जाएँ। वैसे भी क्रूरता कायरता की निशानी है। ऐसे लोग इस बात से अनजान रहते हैं कि दूसरों पर दया करना साहस का काम है। दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले का साथ खुदा देता है। वैसे भी कहते हैं कि वह जीना भी क्या जीना, जो किसी के काम न आए।
1 | 2  >>  
और भी
ऐसा उगलो ही क्यों कि न उगल सको न निगल
फैसले से पहले विवेक से पूछ लें
घुल-घुलकर न जिएँ, घुल-मिलकर जिएँ
जो है जगा, उसे किसी ने नहीं ठगा
'ठोंक-पीटकर' करें अपने गुरु का चयन
उसे जूठा तो चलता है, लेकिन झूठा नहीं