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ऐसा उगलो ही क्यों कि न उगल सको न निगल
अब साँप तो अपनी शारीरिक बनावट के चलते उगल नहीं पाता, लेकिन मनुष्य में उगलने की ताकत होने के बाद भी परिस्थिति उसे उगलने नहीं देती, क्योंकि वह बनी ही इसी कारण है कि वह पहले ही कुछ उल्टा-सीधा उगल चुका होता है यानी बोल या कर चुका होता है। ऐसी स्थिति में समझदारी यही कहती है कि जिसमें कम नुकसान हो वो कर लिया जाए।

सबसे अच्छी बात तो यह है कि अपने द्वारा की गई गलती को स्वीकार कर लिया जाए ताकि बात आगे न बढ़े और आपकी छवि भी बनी रहे कि गलती से हो गया आगे से ऐसा नहीं होगा। लोग भी भूल मानकर उस बात को भूल जाएँगे। यदि ऐसे में गलती न मानकर लाग-लपेट करने की कोशिश की जाती है तो बात बिगड़ती है।

सामने वाले को भी समझ में आ जाता है कि गलती पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। तब कोई आप पर यकीन नहीं करता। इसलिए कुआँ और खाई के बीच खड़े होने की स्थिति में गलती स्वीकार कर बीच का रास्ता अपनाकर उस स्थिति से बाहर निकल आया जाए। लेकिन अव्वल तो ऐसा काम ही क्यों किया जाए कि दोराहे पर खड़ा होना पड़े। इसके लिए जरूरी है कि कुछ कहने-करने से पहले हमेशा खूब सोच-विचार कर लिया जाए, तब ही ऑकवर्ड स्थिति में फँसने से बचा जा सकता है।

और अंत में, आज 'ऑकवर्ड मूवमेंट डे' है। आज आप ऐसे किसी क्षण को याद करें जब आपकी हालत भी साँप-छछूँदर जैसी हुई थी और सोचें कि वह स्थिति क्यों निर्मित हुई थी। जड़ में जाने पर आपको अपनी गलती पता चलेगी। वैसी गलती आगे से न हो, इसका ध्यान रखने पर ही आप फिर दुविधा में नहीं फँसेंगे।

वैसे भी जब मन में कुछ हो और दिखा कुछ रहे हों, तो साँप-छछूँदर की स्थिति तो बनना ही है, बनती ही है। इसलिए हमेशा जो हो, जैसा हो। वैसा कहो, दिखाओ, तो जो भी निगलोगे, उसे उगलने की नौबत नहीं आएगी। अरे भई, इसमें मेरी न तो 'हाँ' है और न ही 'ना।' मैं सिर्फ चुप रहूँगा।
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