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ऐसा उगलो ही क्यों कि न उगल सको न निगल
मनीष शर्मा
वैक्यूम क्लीनर बनाने वाली एक कंपनी ने नई सुविधाओं के साथ एक नया मॉडल बाजार में उतारा। उत्साही सेल्समैन की एक टीम घर-घर जाकर उसकी बिक्री में लग गई। एक सेल्समैन ने इसके लिए अनोखा तरीका सोचा।

वह एक संभ्रांत कॉलोनी में पहुँचा और एक बंगले की घंटी बजाई। घर की मालकिन ने दरवाजा खोला। इसके पहले कि वह उससे कुछ पूछती, उत्साहित सेल्समैन घर में घुस गया और एक प्लास्टिक की थैली में भरकर लाए गए गाय के गोबर को उसने हॉल में बिछे महँगे कालीन पर उलट दिया। इससे उस महिला की त्यौरियाँ चढ़ गईं।

वह कुछ कहती, इसके पहले वह बोला- मैडम, आप नाराज मत होइए। यदि मैं इस कालीन पर बिखरे गोबर को अपने नए शक्तिशाली वैक्यूम क्लीनर से एकदम चकाचक साफ न कर पाया तो मैं यह सारा गोबर खुद खा लूँगा। इस पर वह बोली- ठीक है, तो इसे खाने के लिए क्या तुम्हें चटनी, अचार या सॉस की जरूरत हो तो बताओ।
  वैक्यूम क्लीनर बनाने वाली एक कंपनी ने नई सुविधाओं के साथ एक नया मॉडल बाजार में उतारा। उत्साही सेल्समैन की एक टीम घर-घर जाकर उसकी बिक्री में लग गई। एक सेल्समैन ने इसके लिए अनोखा तरीका सोचा।      


इस पर सेल्समैन हक्का-बक्का होकर बोला- आप ऐसा क्यों कह रही हैं? क्या आपको मेरी बात पर यकीन नहीं। महिला- तुम्हारी बात पर यकीन न होने वाली बात तो बाद में आएगी। अभी तो हमारे घर में लाइट नहीं है। यह सुनकर सेल्समैन को जैसे साँप सूँघ गया। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में वह अब क्या करे।

दोस्तो, इसे कहते हैं साँप-छछूँदर वाली स्थिति कि न निगला जाए, न उगला जाए। और ऐसी स्थिति के लिए कोई और नहीं बल्कि वह व्यक्ति खुद दोषी होता है। उसी के किए या कहे के कारण ही ऐसी स्थिति खड़ी होती है, जिसमें वह ऐसे दोराहे पर आकर खड़ा हो जाता है कि क्या करें, क्या न करें। उसे कुछ सूझता ही नहीं।

दोनों ही स्थितियों में मरण है यानी आगे कुआँ है तो पीछे खाई। अब इससे बाहर निकलने के लिए जो करना है, वह भी खुद को ही करना है। जो भुगतना है, खुद को ही भुगतना है। यदि आप भी अपने आपको गाहे-बगाहे ऐसी स्थिति में पाते हैं तो निश्चित ही आप कुछ भी कहने-करने से पहले सोचते-विचारते नहीं। बस जो मन में आया कह दिया, कर दिया। तब तो ऐसे एक नहीं अनेक नाजुक क्षणों से आपको गुजरना पड़ेगा ही। जो आपकी स्थिति को हास्यास्पद ही नहीं, तकलीफदेह भी बनाते हैं।
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