ठंड के दिनों में एक व्यापारी की गरम दूध पीने की इच्छा हुई। उसने अपने बेटे को पैसे देकर दूध वाले की दुकान से दो कुल्हड़ दूध लाने भेजा। लड़का जब पास की दुकान से दूध लेकर लौट रहा था तो एक पत्थर की ठोकर से उसका संतुलन बिगड़ गया। वह गिरा तो नहीं, लेकिन उसके कुल्हड़ों से कुछ दूध छलक गया।
जब वह अपनी दुकान पर पहुँचा तो कुल्हड़ों में कम दूध देखकर व्यापारी ने उससे पूछा- ये दूध कम क्यों है? मैंने तो तुझे पूरे पैसे दिए थे। इस पर बेटे ने ठोकर लगकर दूध ढुलने की बात व्यापारी को बताई। लेकिन व्यापारी संतुष्ट नहीं हुआ और उसने दोबारा पूछा। इस पर बेटा चिढ़कर बोला- क्या आपको मेरी बात पर भरोसा नहीं?
व्यापारी- मुझे तेरी बात पर पूरा भरोसा है, लेकिन मैं आश्वस्त होना चाहता था कि तू सही कह रहा है। अगर वाकई दूध ढुला है तो आगे से ज्यादा सँभलकर चलना। हाँ, यदि दुकानदार ने ही तुझे कम दूध दिया होता, तो यह परेशानी वाली बात थी, क्योंकि इसका मतलब होता कि दूध वाले ने तुझे बच्चा समझकर ठग लिया। और एक बार तू ठगा जाता तो तुझे इसकी आदत पड़ जाती जो जीवनभर ठीक नहीं होती। फिर तो नुकसान ही नुकसान है। | | आज 'विश्व उपभोक्ता संरक्षण दिवस' है। बढ़ते बाजारवाद में हर कंपनी और दुकानदार अपने सामान या उत्पाद को बेचने के लिए उपभोक्ताओं को तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं, जिनके चक्कर में ग्राहक कई बार गलत उत्पाद ले आते हैं और बाद में ठगा-सा महसूस करते हैं। |
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दोस्तो, हम सभी को भी यह बात सीखनी चाहिए कि यदि ठगना बुरा है तो ठगाना भी उतना ही बुरा है। आप अपने मन को यह सोचकर नहीं बहला सकते कि सामने वाले ने हमारी मासूमियत, हमारी भलमनसाहत, हमारे विश्वास का फायदा उठाया और हमें ठग लिया। इसके लिए दोषी वह है, हम नहीं। यदि आप ऐसा सोचते हैं तो दिल बहलाने के लिए गालिब ये खयाल अच्छा है। लेकिन आप यह भी जानते हैं कि यह खयाल उतना अच्छा भी नहीं, जितना आप सोचते हैं। क्योंकि आपके बहलाने पर भी दिल है कि मानता ही नहीं। भीतर ही भीतर यह बात आपको कचोटती रहती है कि आप ठगा गए, बेवकूफ बन गए।
बेवकूफ बनने के इस भाव से आपका चैन काफूर हो जाता है और आपको कुछ भी नहीं भाता। कोई आपको बुद्धू बना गया, यह बात आपको परेशान करती रहती है। इससे आपका आत्मविश्वास भी कम होता है। इससे बाहरी तौर पर ही नहीं, आंतरिक तौर पर भी नुकसान होता है।
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