वह बोला- मेरी मती मारी गई थी जो मैंने आपको ही पीट दिया। मुझे नहीं पता था कि आप ही महात्मा दादू हैं। आप तो रास्ता साफ कर रहे थे। इस पर दादूजी ने मुस्कराते हुए कहा- हाँ, इस रास्ते की कँटीली झाड़ियों से राहगीरों को कष्ट न हो, इसलिए मैं इन्हें हटा रहा हूँ।
जब मैं मनुष्य के मन में समाहित अवगुणों रूपी कँटीली झाड़ियों को हटाने की सलाह देता हूँ तो भौतिक संसार के काँटों को राह में कैसे रहने दूँ? वैसे तुम अपने किए पर दुःखी मत हो। तुमने कुछ गलत नहीं किया।
तुम्हें सच्चे गुरु की तलाश है। आज की दुनिया में तो एक मटका भी ठोंक-पीटकर देख लेने के बाद ही खरीदा जाता है। इसी तरह तुमने जीवन की सच्ची राह दिखाने वाले गुरु को ठोंक-पीटकर देख लिया, तो इसमें गलत क्या किया?
दोस्तो, ऐसे होते हैं महात्मा और ऐसी ही होती हैं उनकी बातें। यह तो एक घटना थी जो अनजाने में घट गई। कृपया आप इसे आजमाने न लगें। वैसे भी ठोंक-पीटकर देखने से दादूजी का तात्पर्य निश्चय ही हर दृष्टिकोण से परख लेने से रहा होगा।
आज जब हम छोटी-सी वस्तु भी खरीदने से पहले दुकानदार से उसकी क्वालिटी, गारंटी आदि छोटे-छोटे बिंदुओं पर जानकारी लेने के बाद उसे देखभाल कर ही लेते हैं, तो फिर जिसे आप अपना गुरु या गाइड बनाना चाह रहे हैं, वह व्यक्ति उसके काबिल है भी या नहीं, यह तो देखना ही होगा। लेकिन हमें यह बात गुरु के चयन तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।
यह बात अन्य क्षेत्रों में भी लागू होती है, जैसे कि जब हमें अपने बच्चे का सही स्कूल/कॉलेज में दाखिला कराना हो, कॅरियर बनाने के लिए गाइड करने वाले सही कोचिंग इंस्टीट्यूट का चयन करना हो, कॅरियर की शुरुआत के लिए सही संस्था का चयन करना हो या विवाह के लिए सही रिश्ते का चयन करना हो आदि। हमें सारे काम देखभाल कर ही करने चाहिए और बहुधा हम करते भी हैं। इसलिए यह बात उनके लिए तो है ही जो इसकी गंभीरता को नहीं समझते, लेकिन उनके लिए भी है जो समझते हैं, ताकि वे और भी सतर्क रहें।
और अंत में, आज संत दादूदयाल जयंती है। इस अवसर पर हम यही कहना चाहेंगे कि यदि आप नियमित रूप से 'गुरुमंत्र' पढ़ रहे हों तो इन्हें भी आत्मसात करने से पहले ठोंक-पीटकर जाँच लें। ठीक है ना?
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