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'ठोंक-पीटकर' करें अपने गुरु का चयन
मनीष शर्मा
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स्वामी दादूदयाल अपने भ्रमण के दौरान एक नगर के बाहर जंगल में बनी झोपड़ी में रहकर वहाँ भक्तिरस के भजन करते और श्रद्धालुओं को तत्वज्ञान के उपदेश देते। उस नगर का कोतवाल गुस्सैल स्वभाव का होने के साथ ही धार्मिक प्रवृत्ति का भी था। वह बहुत दिनों से सच्चे गुरु की तलाश में था। महात्मा दादू के बारे में सुनकर उसके मन में उनसे मिलने का विचार आया।

वह घोड़े पर सवार होकर उनसे मिलने निकल पड़ा। जंगल में बहुत दूर तक निकल जाने पर भी जब उसे दादूजी की झोपड़ी दिखाई नहीं दी तो वह सोचने लगा कि शायद मैं रास्ता भटक गया। इतने में उसकी नजर काँटेदार झाड़ियों को काटकर रास्ते की सफाई कर रहे एक व्यक्ति पर पड़ी। कोतवाल ने उससे अपने अंदाज में पूछा- अबे ओए!

महात्मा दादू की झोपड़ी किस तरफ है? अपने कार्य में तल्लीन उस व्यक्ति ने कोई जवाब नहीं दिया। यह कोतवाल को अपना अपमान लगा और वह गाली देते हुए बोला- 'क्या मैं तेरे बाप का नौकर हूँ? जवाब क्यों नहीं देता?' इस पर भी वह व्यक्ति केवल धीरे से मुस्करा दिया।
  स्वामी दादूदयाल अपने भ्रमण के दौरान एक नगर के बाहर जंगल में बनी झोपड़ी में रहकर वहाँ भक्तिरस के भजन करते और द्धालुओं को तत्वज्ञान के उपदेश देते। उस नगर का कोतवाल गुस्सैल स्वभाव का होने के साथ ही धार्मिक प्रवृत्ति का भी था।      


इस पर गुस्सैल कोतवाल खीझ गया और उसने अपने चाबुक से उस व्यक्ति को मारना शुरू कर दिया। लेकिन वह व्यक्ति चाबुक लगने के बाद भी मुस्कराता रहा। इस पर कोतवाल ने सोचा कि शायद यह कोई पागल है और वह उसे ठोकर मारकर आगे बढ़ गया। आगे जाकर उसे एक अन्य व्यक्ति से दादूजी के बारे में पूछा।

इस पर वह बोला कि कोतवाल सा'ब! दादूजी इसी रास्ते पर पीछे कँटीली झाड़ियाँ हटाकर रास्ता साफ कर रहे हैं। क्या वे आपको नहीं मिले। हैरान कोतवाल तेजी से घोड़ा पलटाकर दादूजी के पास पहुँचा। वे तब भी मुस्कराते हुए झाड़ियाँ काट रहे थे। धक्के की वजह से लगी चोट पर उन्होंने पट्टी बाँध ली थी। कोतवाल घोड़े से उतरकर उनके पैरों में गिर पड़ा और रोते हुए क्षमा माँगने लगा।
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