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उसे जूठा तो चलता है, लेकिन झूठा नहीं
मनीष शर्मा
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जब से महर्षि मतंग अपनी शिष्या शबरी से यह कहकर वैकुंठ गए कि बेटी, निरंतर साधना में लगी रहना, एक दिन राम के रूप में प्रभु तेरी कुटिया में अवश्य आएँगे, तब से शबरी प्रभु की प्रतीक्षा में प्रतिदिन कुटिया को बुहारती।

उनके सत्कार के लिए कई तरह के फलों के दोने भरकर रखती, क्योंकि वह जानती थी कि जब राम आएँगे तब वो बावरी हो जाएगी, उसे कुछ नहीं सूझेगा, फिर वह कुछ नहीं कर पाएगी। फिर वह द्वार पर बैठकर दूर तक टकटकी लगाकर देखती रहती कि प्रभु आएँगे। इस तरह राह तकते हुए वह बूढ़ी हो गई। उसकी कमर झुक गई, लेकिन आस नहीं टूटी।

एक दिन एक वृद्ध आकर बोला- शबरी! तेरे राम भ्राता सहित आ रहे हैं। यह सुनकर शबरी बिना लाठी का सहारा लिए हड़बड़ा कर भागी और राम के चरणों में गिरकर आँसुओं से उनके पैर धोने लगी। फिर कुटिया के अंदर ले जाकर दोनों को आसन पर बिठाया और दोने में रखे फल उनके सामने रखते हुए बोली- प्रभु, मैं आपको अपने हाथों से फल खिलाऊँगी। खाओगे न इस अछूत भीलनी के हाथ के फल? यह कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगी। श्रीराम बोले- माँ, मैं तो भक्ति का भूखा हूँ।
  जब से महर्षि मतंग अपनी शिष्या शबरी से यह कहकर वैकुंठ गए कि बेटी, निरंतर साधना में लगी रहना, एक दिन राम के रूप में प्रभु तेरी कुटिया में अवश्य आएँगे, तब से शबरी प्रभु की प्रतीक्षा में प्रतिदिन कुटिया को बुहारती।      


जाति-पाति, कुल-धर्म से मेरा नाता नहीं। मुझे बहुत भूख लगी है, जल्दी से फल खिलाएँ। इस पर शबरी फलों को चख-चखकर, कि मीठे हैं या नहीं, राम को देती जाती और राम बिना किसी झिझक के बड़े प्रेम से उन्हें खाते जाते। इस तरह शबरी का सब्र रंग लाया और उसकी कुटिया धन्य हो गई, वो धन्य हो गई।

दोस्तो, वाकई धन्य हैं शबरी और उनकी साधना, जिसके चलते आखिर भगवान को भी उनकी कुटिया तक आना ही पड़ा। कहते हैं 'अतिथि देवो भवः' लेकिन यहाँ तो वाकई जो अतिथि बनकर आया वह स्वयं ईश्वर ही थे। तब शबरी उनके सत्कार में कैसे पीछे रहतीं।

उन्होंने भले ही राम को जूठे बेर, फल खिलाएँ हों, लेकिन उनमें प्रेम था, भक्ति थी। और भगवान तो प्रेम का भूखा होता है। उसके लिए जूठन का कोई मतलब नहीं। वैसे भी जहाँ प्रेम हो, भक्ति हो, वहाँ जूठा-जूठन की शब्दावली चलती भी नहीं।
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