इससे बचने का उपाय यही है कि माता-पिता को अपने बच्चों को इस तरह से भयाक्रांत नहीं करना चाहिए कि उनके बाल सुलभ मन को चोट पहुँचे और भय के घाव हमेशा के लिए उनके मन-मस्तिष्क में घर कर जाएँ, अपने निशान छोड़ जाएँ।
लेकिन अधिकतर पालक यह बात नहीं समझते और अपने बच्चों पर काबू पाने के लिए उन्हें तरह-तरह से डराते-धमकाते हैं। कोई रोते बच्चे को चुप कराने के लिए म्याऊँ-म्याऊँ कर बिल्ली से डराता है, कोई भौं-भौं कर कुत्ते से। कोई बाबा-बूबू का डर दिखाता है तो कोई भूत-प्रेत का।
यह सोचे बिना कि ऐसा करके वे अपने ही हाथों अपने बच्चे को कमजोर और कायर बना रहे हैं। क्योंकि ये डर उसके मन में उस समय बैठ जाते हैं, जब उसकी बुद्धि का विकास भी होना पूरी तरह शुरू नहीं हुआ होता और उसे जिंदगीभर डराते रहते हैं। तब जिस बच्चे को आप वीरू यानी बहादुर बनाने के सपने देखते थे, वह आपकी गलतियों की वजह से ही भीरू यानी कायर बन जाता है।
इसलिए बच्चे को कभी बेकार के डर न दिखाएँ। कई बार भय के बोझ तले दबे बच्चे बड़े होकर वह सब नहीं कर पाते जिसे करने की उनके अंदर क्षमता थी, पैदाइशी गुण थे। क्योंकि भय उनकी चिंतन शक्ति और इच्छाशक्ति को कमजोर जो कर देता है। यदि आप भी ऐसे किसी भय से भयाक्रांत रहते हैं तो आज से ही इस पर काबू पाने की कोशिश करें। समय लगेगा, लेकिन निरंतर प्रयासों से आप इससे पीछा छुड़ा सकते हैं। इसके लिए उस भय के भूत के सामने साहस, निडरता, अभय का देवता खड़ा करना होगा। तब वह खुद चुपचाप या तो आपके मन से निकल जाएगा या फिर डरकर एक कोने में बैठ जाएगा, सो जाएगा। तब आप पूरी शक्ति से, पूरे साहस से अपने सपनों को पूरा करने में जुट सकते हैं।
और अंत में, आज 'अल्फ्रेड जोसेफ हिचकॉक डे' पर यह बात गाँठ बाँध लें कि भय केवल हमारे मन के भाव होते हैं। यदि आप इन भावों पर नियंत्रण कर लेंगे तो कभी जाने हुए तो क्या, अनजाने भयों से भी नहीं डरेंगे। अरे भई, अब तो बड़े बन जाओ। ये बॉस से डरना बंद करो।
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