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रूप बदलकर होते हैं सबके सपने पूरे
मनीष शर्मा
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एक जंगल के तीन विशाल वृक्ष अपने भविष्य के बारे में बातें कर रहे थे। एक वृक्ष बोला- मेरा सपना है कि मैं हीरे-जवाहरातों से भरा एक खूबसूरत बक्सा बनूँ। दूसरा बोला- मैं एक ऐसा जहाज बनना चाहता हूँ जिसमें कोई राजा सफर का आनंद उठाए। तीसरा बोला- मैं इस जंगल का सबसे बड़ा वृक्ष बनना चाहता हूँ, जिसे लोग पहाड़ी की चोटी से निहारें और सोचें कि मैं ईश्वर के कितने करीब हूँ।

कुछ समय बाद लकड़हारों ने पहले वृक्ष को काटकर एक बढ़ई को और दूसरे वृक्ष को एक नाविक को बेच दिया। तीसरे वृक्ष को भी काट दिया गया और उसे एक अंधेरे गोदाम में डाल दिया गया। कटने के बाद तीनों वृक्ष निराश थे, क्योंकि जैसा वे चाहते थे, वैसा हुआ नहीं। पहले वृक्ष से बढ़ई ने बक्सा तो बनाया लेकिन भूसा रखने का। दूसरे वृक्ष से नाविक ने छोटी-सी नौका बनाई। इस तरह तीनों के सपने टूट गए।

कई वर्ष बीतने के बाद एक दिन एक स्त्री-पुरुष उस तबेले में आकर रुके जहाँ कि भूसा भरने वाला बक्सा रखा था। उस स्त्री ने वहाँ एक अत्यंत खूबसूरत और ओजस्वी बच्चे को जन्म दिया। पुरुष ने कोई जगह न पाकर बच्चे को उस बक्से में लिटा दिया। वह वृक्ष जिसकी लकड़ी से वह बक्सा बना था, अचानक उसे महसूस हुआ कि उसका सपना पूरा हो गया।

विश्व का बेशकीमती हीरा उसमें रखा था जिसके आगे सारे जवाहरातों की चमक भी फीकी थी। घटना के कुछ वर्षों बाद जब वह बच्चा बड़ा हो गया तो वह दूसरे वृक्ष से बनी नाव में कुछ लोगों के साथ बैठकर कहीं जा रहा था। अचानक तूफान आया, नाव डूबने लगी। तभी उस युवक ने आसमान में हाथ ऊपर उठाकर कहा- शांत हो जाओ। और तूफान थम गया।
  स्त्री ने वहाँ एक अत्यंत खूबसूरत और ओजस्वी बच्चे को जन्म दिया। पुरुष ने कोई जगह न पाकर बच्चे को उस बक्से में लिटा दिया। वह वृक्ष जिसकी लकड़ी से वह बक्सा बना था, अचानक उसे महसूस हुआ कि उसका सपना पूरा हो गया।      


दूसरे वृक्ष का सपना भी पूरा हो गया क्योंकि उसमें तो राजाओं का भी राजा यात्रा कर रहा था। अंत में कुछ लोग आए और तीसरे वृक्ष की लकड़ी को उठाकर ले गए। उसका उन्होंने सलीब बनाया और उसी युवक के कंधों पर लाद दिया।

वह उसे घसीटता हुआ पहाड़ की चोटी पर ले गया। युवक को हाथ-पैरों में कील ठोंककर सलीब पर लटका दिया गया। तीसरा वृक्ष अभिभूत था। वह ईसा मसीह के रूप में ईश्वर के कितने निकट था। उसका भी सपना पूरा हो चुका था।
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