स्वामी रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों को उनके स्वभाव के हिसाब से बहुत ही सहज तरीके से उन्हें व्यावहारिक व आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा देते थे।
एक बार उनका निरंजन नामक शिष्य जब नाव में बैठकर गंगा पार कर रहा था तो उसमें सवार दो व्यक्ति रामकृष्ण के बारे में ऊलजुलूल बातें करने लगे। अपने गुरु की निंदा सुनकर निरंजन को क्रोध आ गया। वह उन्हें टोकते हुए बोला- आप लोगों ने अब यदि उनके बारे में एक भी गलत शब्द कहा तो ठीक नहीं होगा।
मैं उनका शिष्य हूँ, मैं जानता हूँ कि वे एक पहुँचे हुए महात्मा हैं। इस पर एक व्यक्ति बोला- तुम भी पागल हो जो उस पागल की बातें मानते हो। उसकी बात सुनकर निरंजन आपे से बाहर होकर बोला- यदि तुमने अपनी बकवास बंद न की तो मैं तुम्हें उठाकर नदी में फेंक दूँगा।बात बढ़ती देख अन्य यात्रियों ने बीच-बचाव करके मामला शांत किया। निरंजन ने आश्रम पहुँचकर गुरु को जब वह घटना बताई तो वे बोले- क्या उनके कहने का मुझ पर कोई असर हुआ? नहीं ना। | | एक बार उनका निरंजन नामक शिष्य जब नाव में बैठकर गंगा पार कर रहा था तो उसमें सवार दो व्यक्ति रामकृष्ण के बारे में ऊलजुलूल बातें करने लगे। अपने गुरु की निंदा सुनकर निरंजन को क्रोध आ गया। |
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तुम्हें ऐसी अनर्गल बातों को सुनकर अपना आपा नहीं खोना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि तुम हमेशा हर स्थिति में अपना मानसिक संतुलन कायम रखो। निरंजन ने उनकी बात अपने मन में उतार ली। इस घटना के कुछ समय बाद स्वामीजी के एक अन्य शिष्य जोगिन के सामने दो व्यक्ति रामकृष्ण का उपहास उड़ाने लगे, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
वैसे भी वह बहुत ही शांत व शर्मीली प्रकृति का था। गुरु को इस बात का पता लगने पर वे जोगिन से बोले- पुत्र! क्या तुम्हारे मन में मेरे लिए कोई श्रद्धा या सम्मान नहीं है जो तुमने अपने गुरु का उपहास करने वालों को एक शब्द भी नहीं कहा। जोगिन ने अपनी गलती स्वीकारते हुए भविष्य में ऐसा न करने का विश्वास दिलाया। इस बात से निरंजन हैरान रह गया।
उसे गुरु का यह दोहरा व्यवहार समझ में नहीं आया। यह बात उसने अपने गुरुभाई नरेन यानी विवेकानंद को बताई तो उन्होंने उसे समझाया- अरे! तुम जानते नहीं, गुरुजी हम सभी का व्यक्तित्व सुधारना चाहते हैं।
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