एक नगर में रहने वाले परसा नामक एक गरीब वैश्य युवक ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 'चना जोर गरम' बेचना शुरू किया। सुबह जल्दी उठकर वह चने तैयार करता और गाँव के बाजार में जाकर खड़ा हो जाता। जल्दी ही उसकी ग्राहकी शुरू हो गई।
लोग उसे आवाज लगाते- ऐ परसा, भाग के एक 'चना जोर गरम' बनाकर ले आ। वह तुरंत तैयार करता और भागकर दे आता। उसके बनाए 'चना जोर गरम' का स्वाद धीरे-धीरे लोगों की जबान पर चढ़ने लगा, जिससे उसकी ग्राहकी बढ़ने लगी। वह पैसों की बचत भी करता था, क्योंकि वह पैसों का महत्व जानता था।
धीरे-धीरे जब उसकी बचत अच्छी-खासी हो गई तो उसने एक ठेला डाल लिया। अब वह 'चना जोर गरम' के साथ चाट-मंगोड़े भी बेचने लगा। इससे उसके चाट-मंगोड़े के शौकीन नए ग्राहक भी बन गए। समय के साथ उसने अपना हुलिया भी थोड़ा-सा बदल लिया।
वह कपड़े भी साफ-सुथरे पहनने लगा। कुछ समय में ही उसका ठेला भी चल निकला। उसके यहाँ लोगों की कतार लगने लगी और लोगों के संबोधन में भी बदलाव आ गया। खरीदार अब उससे कहते- परसु भाई, सौ ग्राम मंगोड़े तो देना। | | एक नगर में रहने वाले परसा नामक एक गरीब वैश्य युवक ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए 'चना जोर गरम' बेचना शुरू किया। सुबह जल्दी उठकर वह चने तैयार करता और गाँव के बाजार में जाकर खड़ा हो जाता। जल्दी ही उसकी ग्राहकी शुरू हो गई। |
| |
माँग बढ़ने पर जब ठेले में भी जगह कम पड़ने लगी तो उसने एक दुकान डाल ली और उसमें खाने-पीने की सभी तरह चीजें रखने लगा ताकि ग्राहकों को हर चीज एक ही जगह पर मिल सके। उसने कुछ नौकर भी रख लिए। वह सफेद धोती-कुर्ता पहनकर और सिर पर टोपी लगाकर गद्दी पर बैठता।
लोग उसकी दुकान पर आते और कहते- कैसे हो लाला परसुरामजी? खाने-पीने की इच्छा हुई तो आपकी दुकान पर चले आए। इस तरह 'चना जोर गरम' से धंधा शुरू करने वाला 'परसा' आज लोगों के लिए 'लाला परसुरामजी' बन चुका था।
दोस्तो, माया की माया, माया ही जाने और कोई दूसरा नहीं। यही माया 'परसा' को 'परसु भैया' और अंत में 'लाला परसुरामजी' बना देती है। कहते भी हैं- माया तेरे तीन नाम, परसु, परसा, परसुराम। यानी व्यक्ति नहीं बदलता, जैसे-जैसे उसकी माया या संपत्ति बढ़ती जाती है, वह लोगों के लिए आदरणीय बनता जाता है।
|